Saturday, 16 December 2017

मदरसों में छात्र या तो मौलवी बन रहे हैं या आतंकवादी ः पाक सेना प्रमुख

पाकिस्तान में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे मदरसों पर सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर इस्लाम की शिक्षा देने वाले मदरसों की अवधारणा पर एक बार फिर ध्यान देना होगा, क्योंकि पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे या तो मौलवी बन रहे हैं या आतंकवादी। पाक अखबार डॉन में बाजवा के बयान का उल्लेख किया गया है। बलूचिस्तान के प्रमुख शहर क्वेटा में एक युवा सम्मेलन में उन्होंने कहा कि मैं मदरसों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मदरसों की मूल भावना कहीं खो गई है। पाकिस्तान में मदरसों की शिक्षा अपर्याप्त है, क्योंकि वह छात्रों को आधुनिक दुनिया के लिए तैयार नहीं करती है। जनरल बाजवा ने कहा कि मदरसों में करीब 25 लाख बच्चे पढ़ते हैं लेकिन वे क्या बनेंगेöक्या वे मौलवी बनेंगे अथवा आतंकवादी बनेंगे। उन्होंने कहा कि देश में इतने छात्रों को नियुक्त करने के लिए नई मस्जिदें खोलना असंभव है। जनरल बाजवा ने कहा कि पाक मदरसों पर अकसर आरोप लगाता है कि वे युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे हैं। इधर हमारे उत्तर प्रदेश में करीब ढाई हजार से ज्यादा मदरसों में अब मजहबी किताबों के साथ-साथ राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की पुस्तकें भी दिखाई देंगी। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने यह फैसला मदरसों के पाठ्यक्रम को सुधारने के लिए बनी 40 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह निर्णय लिया है। आमतौर पर मदरसों को लेकर आम जनों में यह भ्रांति है कि यहां सिर्फ मजहबी शिक्षा दी जाती है और ऐसे केंद्र से निकले बच्चे मामूली ज्ञान अर्जित करते हैं, जिससे आगे चलकर उनके लिए रोजगार का गंभीर संकट पैदा हो जाता है। सरकार की असली चिन्ता इसी बात को लेकर है कि मदरसों की शिक्षा देने की पद्धति में बदलाव आए। वे भी समय के साथ चलें। आज जो हालात हैं, वह चिन्ताजनक इसलिए हैं कि मदरसों ने खुद को मध्ययुगीन खांचे से बाहर निकलने की नहीं सोची। सरकार इस बात का महत्व समझती है कि मदरसा शिक्षा को आधुनिक और पारदर्शी बनाना कितना जरूरी है? आज के दौर में बच्चों को विकासपरक शिक्षा की आवश्यकता है। वैश्विक माहौल तेजी से बदल रहा है और उसमें बच्चों को ज्यादा अपडेट किया जाना जरूरी है। अगर पाकिस्तान के सेना प्रमुख मदरसों में शिक्षा के सुधार की बात कर रहे हैं तो कुछ मदरसों में कट्टरपंथी तालीम को रोकना कितना जरूरी है। रोजगारपरक शिक्षा मिलेगी तो बेरोजगारी का संकट भी काफूर होगा। पाक में सेना की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ऐसे में जनरल बाजवा का बयान मायने रखता है।

-अनिल नरेन्द्र

वैज्ञानिकों ने भी माना रामसेतु मानव निर्मित है

भारत में संकीर्ण राजनीति की वजह से भले ही रामसेतु को विवादित मुद्दा बना दिया गया और इसकी प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन भूगर्भ वैज्ञानिकों, आर्कियोलॉजिस्ट की टीम ने सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों और सेतु स्थल के पत्थरों और बालू का अध्ययन करने के  बाद यह पाया गया है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु का निर्माण किए जाने के संकेत मिलते हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिक भी अब यह मानने पर विवश हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच स्थित प्राचीन एडम्स ब्रिज यानी रामसेतु असल में मानव निर्मित है। भारत के रामेश्वरम के करीब स्थित द्वीप पमबन और श्रीलंका के द्वीप मन्नार के बीच 50 किलोमीटर लंबा अद्भुत पुल कहीं और से लाए पत्थरों से बनाया गया है। वैज्ञानिक इसको एक सुपर ह्यूमन उपलब्धि मान रहे हैं। इनके अनुसार भारत-श्रीलंका के बीच 30 मील के क्षेत्र में बालू की चट्टानें पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, लेकिन इन पर रखे गए पत्थर कहीं और से लाए गए प्रतीत होते हैं। यह करीब सात हजार साल पुरानी है जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं। बता दें कि रामसेतु पुल को श्रीराम के निर्देशन में कोरल चट्टानों और रीफ से बनाया गया था। जिसका विस्तार से उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। रामसेतु की उम्र रामायण के अनुसार 3500 साल पुराना बताया जाता है। कुछ इसे आज से 7000 साल पुराना बताते हैं। रामसेतु का उल्लेख कालिदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। भारतीय सैटेलाइट और अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान नासा ने उपग्रह से खींचे चित्रों में भारत के दक्षिण में धनुषकोटी तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम पमबन के मध्य समुद्र में 48 किलोमीटर चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भूभाग की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु या राम का पुल माना जाता है। प्राचीन वास्तुकारों ने इस संरचना की परत का उपयोग बड़े पैमाने पर पत्थरों और गोल आकार की विशाल चट्टानों को कम करने में किया और साथ ही कम से कम घनत्व तथा छोटे पत्थरों और चट्टानों का उपयोग किया जिससे आसानी से एक लंबा रास्ता तो बना ही साथ ही समय के साथ यह इतना मजबूत भी बन गया कि मनुष्यों व समुद्र के दबाव को भी सह सके। तत्कालीन यूपीए-1 सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था कि कोई सबूत नहीं है कि रामसेतु कोई पूजनीय स्थल है। साथ ही सेतु को तोड़ने की इजाजत मांगी गई थी। बाद में कड़ी आलोचना के बीच तत्कालीन सरकार ने यह हलफनामा वापस ले लिया था। वैज्ञानिक इसे सर्वश्रेष्ठ मानवीय कृति बता रहे हैं। जय श्रीराम।

Thursday, 14 December 2017

नोटबंदी और जीएसटी के झटके से उबरने में अभी लगेगा समय

आठ नवम्बर 2016 को नोटबंदी का ऐलान हुआ था। रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी क्रीन पर आकर इसका ऐलान करके सबको हैरान-परेशान कर दिया था। इस फैसले के कई राजनीतिक-आर्थिक, सामाजिक असर और पहलू रहे। उस दिन पीएम मोदी ने नोटबंदी को भारतीय राजनीति में गेम चेंजर क्षण कहा था। तत्काल प्रभाव से 500 और 1000 रुपए के नोट पर रोक लगाने की घोषणा की और उसे बदलने के लिए एक खास समय सीमा दी। इसके बाद शुरू हुआ आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर इस बड़े फैसले के नफे-नुकसान का आकलन का दौर। जिस समय नोटबंदी हुई उस समय शायद ही किसी को यह अंदाजा रहा हो कि इसके इतने दूरगामी असर होंगे। नोटों को बदलने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगने लगीं। 100 से ज्यादा लोगों ने ऐसा करते-करते दम तोड़ दिया। एक साल बाद भी लोग इस फैसले से उबर नहीं पाए हैं। रही-सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी है। दोनों ही कदम बगैर ठीक से होमवर्क किए लागू कर दिए गए। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों से अर्थव्यवस्था को लगे झटके को देखते हुए कहा है कि अर्थव्यवस्था को इस स्थिति से पूरी तरह उबरने और उच्च वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए दो साल के समय की और जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह एक झटका है जिसकी नकारात्मक धारणा के साथ शुरुआत हुई है। इसमें कुछ सुधार आ सकता है और उसके बाद ही कुछ फायदा मिल सकता है। फिलहाल इस समय इसमें परेशानी है और लाभ बाद में आएगा। कितना फायदा होगा और कितने अंतराल के बाद यह होगा, यह देखने की बात है। रेड्डी ने मुंबई में सप्ताहांत पर संवाददाताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में कहा कि इस समय आर्थिक वृद्धि को लेकर कोई अनुमान लगाना काफी मुश्किल काम है। उन्होंने कहा कि यह कहना अभी मुश्किल है कि अर्थव्यवस्था फिर से सात से आठ प्रतिशत की संभावित उच्च वृद्धि के रास्ते पर कब लौटेगी। उन्होंने याद किया कि जब वह आरबीआई के गवर्नर थे, उसके मुकाबले पिछले तीन साल में कच्चे तेल के दाम एक-तिहाई पर आ गए थे। हालांकि इस बीच जीएसटी लागू होने, नोटबंदी का कदम उठाने और बैंकों में भारी एनपीए की वजह से आर्थिक वृद्धि के दौरान पिछली सरकार में बिना सोच-विचार के दिए गए कर्ज और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर टेलीकॉम तथा कोयला क्षेत्र में घटे घटनाक्रम से कंपनी क्षेत्र पर काफी दबाव बढ़ गया है। इस समूचे घटनाक्रम से बैंकिंग तंत्र में फंसा कर्ज 15 प्रतिशत तक बढ़ गया है।

-अनिल नरेन्द्र

कांग्रेस में राहुल युग की शुरुआत

आखिर राहुल गांधी की ताजपोशी हो ही गई। सोमवार को राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाल लिया। वे निर्विरोध चुने गए। कांग्रेस के इस शीर्ष पद के लिए केवल राहुल गांधी ने ही नामांकन किया था। राहुल 16 दिसम्बर को अपना काम संभालेंगे। इस चुनाव के साथ ही पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव हुआ है। राहुल गांधी अब अपनी मां सोनिया गांधी की जगह संभालेंगे। बता दें कि सोनिया गांधी 19 साल तक इस पद पर रहीं। अध्यक्ष के तौर पर सोनिया के 19 साल के कार्यकाल के समापन के बाद देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की कमान संभालना राहुल के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। विपक्षी नेता पिछले कुछ सालों से उन्हें शहजादा और कई अन्य नामों से पुकार कर उनके महत्व को कम करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते रहे हैं। राहुल अपनी दादी इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार के समय राष्ट्रीय टेलीविजन और अखबारों में छपी तस्वीरों में अपने पिता राजीव गांधी के साथ प्रमुखता से दिखाई दिए थे। उसके बाद उनके पिता राजीव गांधी की 1991 में हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार में राहुल लगभग पूरे देश की सहानुभूति के केंद्र में रहे। राहुल का जन्म 19 जून 1970 को हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक राहुल ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज, हार्वर्ड कॉलेज और फ्लोरिडा के रोलिस कॉलेज से कला में स्नातक तक की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रीनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फिल किया। नेहरू-गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी का अभी तक का राजनीतिक जीवन सुर्खियों का मौहताज नहीं रहा है किन्तु कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी असली परीक्षा चुनावी मझधार में पिछले कुछ समय से पार्टी की डगमगाती नैया को विजय के तट तक सही सलामत पहुंचाने की होगी। राहुल को जब 2013 में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था उन्होंने जयपुर में भाषण के दौरान अपनी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की इस बात को बड़े भावनात्मक ढंग से कहा था कि सत्ता जहर पीने के समान है। हालांकि इसके ठीक पांच साल बाद अब उन्हें यह विषपान करना पड़ेगा क्योंकि अब वह कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। कांग्रेस की कमान संभालने जा रहे राहुल नेहरू-गांधी परिवार में पांचवीं पीढ़ी के नेता हैं। यह सिलसिला आजादी से पहले मोती लाल नेहरू से शुरू हुआ था। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार गुजरात चुनाव राहुल के लिए एक कड़ी परीक्षा साबित होगी। अगर इस चुनाव में पार्टी कुछ बेहतर भी कर पाती है तो निश्चित तौर पर पार्टी के भीतर और बाहर उनकी विश्वसनीयता में इजाफा होगा। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे मझे हुए नेता और कुशल वक्ता से मुकाबले के लिए अपनी रणनीति में काफी बदलाव किए हैं। उन्होंने जहां गब्बर सिंह टैक्स जैसे जुमले बोलने शुरू कर दिए हैं वहीं ट्विटर के माध्यम से उन्होंने भाजपा सरकार पर आक्रमण तेज कर दिया है। गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने अपनी छवि सुधारी है। अब लोग उन्हें न केवल गंभीरता से सुनते हैं बल्कि बड़ी संख्या में उनकी रैलियों को अटैंड भी करते हैं। कांग्रेस में अब राहुल युग की शुरुआत हो चुकी है।

Wednesday, 13 December 2017

ईवीएम पर फिर उठा विवाद

गुजरात के विधानसभा चुनाव में फिर ईवीएम का मुद्दा उठ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन मोढवाडिया ने शनिवार को पोरबंदर के मुस्लिम बहुल इलाके मेमनवाड़ा के तीन मतदान केंद्रों पर ईवीएम से संभावित छेड़छाड़ की शिकायत की और कहा कि कुछ मशीनें ब्लूटूथ के जरिये बाहरी उपकरणों से जुड़ी पाई गईं। इससे पहले उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में मेयर की सीट पर खाता खोलने में नाकाम रही समाजवादी पार्टी (सपा) ने हार के लिए ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया था। शनिवार को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, जिन जगहों पर बैलेट पेपर से मतदान हुआ वहां भाजपा सिर्फ 15 प्रतिशत सीटें जीत पाई। जबकि जिन जगहों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया, उन जगहों पर भाजपा 46 प्रतिशत सीटें जीती। आम आदमी पार्टी के सीनियर नेता और यूपी के प्रभारी संजय सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा नगर निगम में ही बहुमत के साथ जीती है, क्योंकि वहां ईवीएम के साथ चुनाव हुए थे। आम आदमी पार्टी बार-बार यह कहती आई है कि जब तक ईवीएम से चुनाव होंगे, तब तक भाजपा जीतती रहेगी। इस बीच अर्जुन मोढवाडिया की शिकायत पर चुनाव आयोग ने कहा है कि उनकी शिकायत की जांच कराई गई है, किसी भी ईवीएम में टैम्परिंग की शिकायत नहीं पाई गई है। वहीं कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल ने आरोप लगाया है कि दलित समुदाय के इलाकों में ईवीएम में गड़बड़ियों की शिकायत ज्यादा है। ईवीएम की गड़बड़ी की वजह से वीपी, पोरबंदर और वालसाड समेत तमाम जिलों में मतदान में रुकावट आई। बताया जाता है कि गड़बड़ी की शिकायत के बाद सूरत में 70 और राजकोट में 35 ईवीएम बदली गईं। भाजपा का कहना है कि मोढवाडिया की ओर से की गई शिकायतें दिखाती हैं कि विपक्षी कांग्रेस कोई बहाना तलाश रही है, क्योंकि वह जानती है कि चुनावों में उसे करारी शिकस्त मिलने वाली है। उधर बसपा प्रमुख मायावती ने यूपी निकाय चुनाव में मिली सफलता से खुश भाजपा को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि वह लोकतंत्र में यकीन करती है तो आम चुनाव ईवीएम के बदले बैलेट पेपर से करवाएं। ईवीएम का मुद्दा थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अब वापस बैलेट पेपर पर जाना तो मुश्किल है पर ईवीएम को टैम्परप्रूफ बनाने का काम चुनाव आयोग का है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना उसका दायित्व भी है।

-अनिल नरेन्द्र

यरुशलम पर ट्रंप का विवादित फैसला

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तमाम विरोधों को नजरंदाज करते हुए गत बुधवार देर रात यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करके बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपना दूतावास तेल अवीव से इस पवित्र शहर में ले जाएगा। इस घोषणा से मध्य पूर्व में नए सिरे से तनाव बढ़ गया है। यरुशलम में अमेरिकी दूतावास स्थानांतरित करने के राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले ने मुस्लिम जगत को हिलाकर रख दिया है। अभी तक कोई भी मुस्लिम देश अमेरिका के फैसले के साथ खड़ा नहीं हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप यरुशलम को इजरायल की राजधानी मान सकते हैं, ऐसा करने वाले वो पहले वैश्विक नेता भी होंगे। मध्य पूर्व के अरब नेताओं का कहना है कि ऐसा करना मुसलमानों को उकसाना होगा और इससे मध्य पूर्व के हालात बिगड़ जाएंगे। यरुशलम इजरायल-अरब तनाव में सबसे विवादित मुद्दा भी है। ये शहर इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों में बेहद अहम स्थान रखता है। पैगम्बर इब्राहिम को अपने इतिहास से जोड़ने वाले ये तीनों ही धर्म यरुशलम को अपना पवित्र स्थान मानते हैं। यही वजह है कि सदियों से मुसलमानों, यहूदियों और ईसाइयों के दिल में इस शहर का नाम बसता रहा है। हिब्रू भाषा में यरुशलम और अरबी में अल-कुंदस के नाम से जाने वाले ये शहर दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है। इस शहर को कई बार कब्जाया गया है। ध्वस्त किया गया है और फिर से बसाया गया है। यही वजह है कि यहां की मिट्टी की हर परत में इतिहास की एक परत छिपी हुई है। अरब मुल्कों के लिए यह शहर इसलिए पवित्र है क्योंकि यहां अल अक्सा मस्जिद स्थित है। यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ या पवित्र स्थान कहते हैं। मस्जिद अल अक्सा इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है और इसका प्रबंधन एक इस्लामिक ट्रस्ट करती है जिसे वक्फ कहते हैं। मुसलमानों का विश्वास है कि पैगम्बर मोहम्मद ने मक्का से यहां तक एक रात में यात्रा की थी और यहां पैगम्बरों की आत्माओं के साथ चर्चा की थी। यहीं से कुछ कदम दूर ही डोम ऑफ द राक्स का पवित्र स्थल है। यहीं पवित्र पत्थर भी है। मान्यता है कि पैगम्बर मोहम्मद ने यहीं से जन्नत की यात्रा की थी। यहूदी इलाके में ही कोटेल या पश्चिमी दीवार है। ये वॉल ऑफ दा माउंट का बचा हिस्सा है। माना जाता है कि यह कभी यहूदियों का पवित्र मंदिर इसी स्थान पर था। इस पवित्र स्थल के भीतर ही द होली ऑफ द होलीज है। यह यहूदियों का सबसे पवित्र स्थान है। ईसाई इलाके में द चर्च ऑफ द होली रोपलंकर है। ये दुनियाभर के ईसाइयों की आस्था का केंद्र है। ये जिस स्थान पर स्थित है वो ईसा मसीह की कहानी का केंद्रबिंदु है। यहीं ईसा की मौत हुई थी, उसे सूली पर चढ़ाया गया था और यहीं से वो अवतरित हुए थे। ट्रंप के फैसले को लेकर दुनियाभर से जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वे काफी तीखी हैं। कुछ देर के लिए अगर पश्चिमी एशिया के देशों को छोड़ भी दें तो फ्रांस जैसे नाटो में उसके सहयोगी देश ने भी इस मंशा का खुला विरोध किया है। बाकी दुनिया भी इसे लेकर काफी असहज दिख रही है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि अगर ऐसा होता है तो पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़ी अशांति की ओर बढ़ने लगेगा। बेशक इससे इजरायल और यहूदी विश्व को किसी तरह की मानसिक संतुष्टि मिले, लेकिन इससे इजरायल की मुश्किलें भी बढ़ेंगी ही। फलस्तीन उग्रवाद का तेवर तीखा होना तय ही है, कई क्षेत्रीय समीकरण भी बदल जाएंगे। इस फैसले का अरब लीग में शामिल 57 देशों ने विरोध किया है। वह इस मुद्दे पर बैठक करेंगे। तुर्की, सीरिया, मिस्र, सऊदी अरब, जॉर्डन, ईरान समेत 10 से अधिक खाड़ी देशों ने अमेरिका को चेतावनी भी दे डाली है। मध्य पूर्व में नए सिरे से तनाव बढ़ सकता है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था। अब देखना यह है कि क्या अमेरिका अपने फैसले पर अडिग रहता है और अरब देशों को शांत कर सकता है या नहीं?

Tuesday, 12 December 2017

मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द

गरीबों का फ्री इलाज नहीं करना मैक्स अस्पताल पर भारी पड़ा। दिल्ली सरकार ने जीवित नवजात को मृत बताकर परिजनों को सौंपने के मामले में शालीमार स्थित दोषी मैक्स अस्पताल का लाइसेंस शुक्रवार को रद्द कर दिया। स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन ने बताया कि अब मैक्स अस्पताल में कोई नया मरीज भर्ती नहीं होगा। जो भर्ती हैं, उनका इलाज इसी अस्पताल में किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस तरह की लापरवाही कतई स्वीकार्य नहीं है। जैन ने कहा कि इस मामले की अंतिम रिपोर्ट आ गई है जिसमें अस्पताल की लापरवाही पाई गई है। स्वास्थ्य मंत्री ने दो टूक कहा कि अस्पतालों की लापरवाहियों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यही वजह है कि राजधानी में पहली बार पूरे अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया गया है। पिछले कुछ समय से देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के शहरों में निजी अस्पतालों के बारे में जैसी गंभीर और मेडिकल पेशे को शर्मसार करने वाली शिकायतें आ रही थीं उन्हें देखते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई आवश्यक हो गई थी। यह अच्छा हुआ कि जहां हरियाणा सरकार की एक समिति ने उपचार में हुए खर्च को अनाप-शनाप तरीके से बढ़ाकर वसूलने वाले फोर्टिस अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की वहीं दिल्ली सरकार ने जीवित शिशु को मृत बताने वाले मैक्स अस्पताल को बंद करने का फैसला किया। निस्संदेह यह कठोर फैसला है, लेकिन जब मनमानी की सीमाएं कुछ निजी अस्पताल पार करने में लगें तब फिर सख्त कदम उठाना जरूरी हो जाता है। दिल्ली के इतिहास में पहली बार किसी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का लाइसेंस कैंसल किया गया है। मैक्स अस्पताल का लाइसेंस कैंसल करके दिल्ली सरकार ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि लोगों के स्वास्थ्य के साथ किसी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दो दिन पहले मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि अगर मरीजों को इलाज के नाम पर लूटा जाएगा, उनके साथ आपराधिक लापरवाही होगी तो किसी भी जिम्मेदार सरकार की तरह कड़ा एक्शन लेना होगा। लेकिन दिल्ली सरकार के इस फैसले को जहां मैक्स अस्पताल ने कठोर बताया है, वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने भी असहमति जताई है। उपचार में लापरवाही बरतने और इलाज के नाम पर लूट करने वाले अस्पतालों को बंद करने जैसे सख्त कदम समस्या का एक हद तक ही उचित समाधान है। सरकारों का जोर बेलगाम अस्पतालों को बंद करने पर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि वे मुनाफाखोरी की दुकानें न बनें।

-अनिल नरेन्द्र