Wednesday, 26 July 2017

सैनेटरी नैपकिन जैसी जरूरी चीज पर 12… जीएसटी?

दुनियाभर के विकसित देशों में सैनेटरी पैड को हेल्थ प्रॉडक्ट माना जाता है। अमेरिका में तो इसे मेडिकल डिवाइस माना गया है। यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन इस पर निगरानी रखता है। इसे कई क्वालिटी टेस्ट पास करने पड़ते हैं। जबकि भारत में इसे तौलिये और पेन्सिल की तरह मिसलेनियस आइटम की श्रेणी में रखा गया है। हमारे देश में करीब 43 करोड़ महिलाएं हैं। यह सैनेटरी नैपकिन उनके लिए सबसे जरूरी चीज है, लेकिन सरकार इसे मिसलेनियस (विविध) की श्रेणी में रखकर 12… जीएसटी लगा रही है। इसका देशभर में विरोध होना स्वाभाविक ही है। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को इसके विरोध में वीडियो भेजने वाली वनश्री वनकर का कहना है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों में सैनेटरी पैड इस्तेमाल करने की आदत नहीं है। ऐसे में उन्हें जागरूक करना है तो फ्री में पैड उपलब्ध कराना होगा। ऐसे में 12… टैक्स देना तो पूरी तरह गलत है। अगर सरकार फ्री नहीं दे सकती तो कम से कम इस पर सब्सिडी तो दे सकती है। सैनेटरी पैड पर जीएसटी वापस करना चाहिए। इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरमैन ललित कुमार मंगलम कहती हैं कि सेल्फ हैल्प गुप्स के बनाए पैड पर जीएसटी बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। वे यूं भी कॉटन का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कमी या छूट कुछ शर्तों के साथ ही होनी चाहिए। वह गांवों में मुफ्त नैपकिन उपलब्ध कराएं और महिलाओं को जागरूक भी करें। इसके साथ ही प्रॉडक्ट की क्वालिटी भी चैक होना चाहिए। असम से सांसद सुष्मिता देव कहती हैं कि सैनेटरी नैपकिन पर इतना ज्यादा जीएसटी लगाने का अर्थ है कि महिलाओं को इसका इस्तेमाल करने के प्रति हतोत्साहित करना। नेशनल हैल्थ मिशन के तहत चल रही स्कीम को मजबूत किया जाना चाहिए। सरकार का यह फैसला बिल्कुल गलत है। महिलाओं की इस मांग से खुद केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी भी इत्तेफाक रखती हैं। उन्होंने कहा कि हमने सैनेटरी नैपकिन को लेकर वित्तमंत्री को कई बार लिखा है। यही नहीं, इसके खिलाफ चल रहे कैंपेन का भी समर्थन किया। सरकार के इस कदम को शेट्टी वुमन आर्गेनाइजेशन के तहत काम करने वाले एनजीओ `शी सेज' ने कोर्ट में भी चुनौती दी है। उसका कहना है कि उसे मिसलेनियस की कैटेगरी से निकालकर बेसिक जरूरतों वाली लिस्ट में रखने की जरूरत है। इसकी अगली सुनवाई 24 जुलाई को होने वाली है। इस संस्था के अनुसार देश की 49.7 करोड़ महिलाओं में से करीब 88… महिलाएं (करीब 43.7 करोड़) सैनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं। वे इसकी जगह फटे-पुराने कपड़ों, फूस, रेत, अखबार तथा प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल करती हैं। सैनेटरी नैपकिन से जीएसटी पूरी तरह हटना चाहिए।

-अनिल नरेन्द्र

क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती बिहार की पटकथा का अंतिम अध्याय

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के परिजनों के घरों पर सीबीआई के छापे से आई अनिश्चितता थमने का नाम नहीं ले रही। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विरोधाभासी संकेत दे रहे हैं। कभी कहते हैं कि महागठबंधन कायम रखने के लिए आरोपों से घिरे लालू यादव के बेटे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का इस्तीफा जरूरी है तो इस सियासी संकट को सुलझाने के लिए कभी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिल रहे हैं तो कभी उनके सिपहसालार बयानबाजी कर रहे हैं और पोस्टर वार शुरू कर रहे हैं। पटना में राजद और जदयू के बीच छिड़ी तकरार अब पोस्टर वार में बदल गई है। राजधानी के आयकर गोलंबर और विधानसभा के निकट लगाए गए पोस्टरों पर जदयू प्रवक्ताओं पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया गया है। पोस्टर के नीचे लिखा है कि नीतीश जी के मना करने के बाद भी यह लोग बाज नहीं आ रहे हैं। यह सब सुशील मोदी के इशारे पर हो रहा है। इस मामले में संजय सिंह ने कहा कि होर्डिंग्स लगाने से कोई सच को दबा नहीं सकता है। जदयू सच को सामने लाने के लिए आवाज उठाता रहेगा। सच के लिए हमें सौ बार भी गर्दन कटानी पड़े तो हम कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटेंगे। मैं अपनी पार्टी का प्रवक्ता हूं, सच बोलता रहूंगा। इधर नई दिल्ली में जब नीतीश कुमार राहुल गांधी से मिले तो दोनों के बीच कोई तीसरा नहीं था। मतलब साफ था कि नीतीश और राहुल आपस में तमाम मुद्दों पर खुलकर बात करना चाहते थे। सूत्रों के अनुसार नीतीश ने राहुल से साफ कहा कि वह गठबंधन के साथ रहना चाहते हैं और 2019 में विपक्षी एकता को मजबूत रखना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने राहुल को समझाने की कोशिश की कि इन कोशिशों के बीच मोदी के मुकाबले की धारणा पर भी कमजोर होने की जरूरत नहीं है। सूत्रों के अनुसार राहुल और नीतीश के बीच यह आम राय बनी कि भले ही तेजस्वी इस्तीफा देने की हड़बड़ी न दिखाएं लेकिन उन पर लगे आरोपों का वह बिन्दुवार जवाब दें और ऐलान कर दें कि अगर उनके खिलाफ सबूत सामने आते हैं या चार्जशीट होती है तो वे खुद पद छोड़ देंगे। लेकिन अब लालू प्रसाद और तेजस्वी से बात करने की जिम्मेदारी कांग्रेस की होगी। नीतीश बुरे फंसे हैं। उनकी मुश्किल यह है कि अगर वह तेजस्वी और तेज प्रताप को मंत्रिमंडल से बाहर करते हैं तो उनका मुख्य सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल उनसे अलग हो सकता है। इस तरह न सिर्फ उनकी सरकार अल्पमत में आ जाएगी, बल्कि जिन सिद्धांतों पर उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन बनाया था और भाजपा को सत्ता से बाहर रखने में कामयाबी हासिल की थी, वह कहीं हाशिये पर न चली जाए। राजद के 80 विधायक नीतीश के साथ हैं। हालांकि सुशील मोदी बहुत पहले ऐलान कर चुके हैं कि नीतीश कुमार पर संकट नहीं आने देंगे। सरकार चलाने में उनकी मदद करेंगे। इशारा साफ है कि उन्हें भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलानी होगी। भाजपा ने यह भी साफ-साफ चेतावनी दी है कि अगर नीतीश ने तेजस्वी और तेज प्रताप का इस्तीफा नहीं लिया तो वह आगामी विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने देंगे। अगर तेजस्वी यादव अपनी बेगुनाही के सबूत को सार्वजनिक नहीं कर पाए तो 28 जुलाई से हफ्तेभर चलने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में पक्ष-प्रतिपक्ष की अग्नि-परीक्षा तय है। लालू परिवार पर संकट के बाद बिहार के सियासी हालात बता रहे हैं कि सदन के अंदर और बाहर महासंग्राम की पटकथा अंतिम अध्याय तक पहुंच चुकी है। तेजस्वी के पास खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए वक्त काफी कम है।

Tuesday, 25 July 2017

टेलीकॉम सेक्टर में घमासान तय है

बीते साल सितम्बर में मुफ्त कॉलिंग और डाटा की सुविधा देकर 12.5 करोड़ ग्राहकों का विशाल परिवार बनाने के बाद अब रिलायंस जियो ने हैंडसेट के बाजार को भी अपनी जेब में करने के लिए इंटेलिजेंस स्मार्ट फोन लांच करने की घोषणा की है वह भी ग्राहकों को मुफ्त मिलेगा और कॉलिंग भी फ्री होगी। 15 अगस्त से यह फोन प्रशिक्षण के लिए उपलब्ध होगा। 24 अगस्त से बुकिंग शुरू होगी। `पहले आओ-पहले पाओ' के आधार पर सितम्बर में डिलीवरी होगी। 50 लाख लोगों तक फोन पहुंचाने का लक्ष्य हर हफ्ते रखा गया है। स्कीम के तहत अनलिमिटेड डाटा मिलेगा और जियो अनलिमिटेड धन धना धन प्लान सिर्फ 153 रुपए में उपलब्ध होगा। शुक्रवार को मुफ्त में 4जी मोबाइल फोन के ऐलान के साथ ही जिस तरह के एयरटेल और वोडाफोन जैसी बड़ी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के शेयर गिरे हैं, उससे भविष्य में इस सेक्टर में मचने वाली उथल-पुथल की झलक साफ मिल रही है। सिर्फ मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियां ही नहीं, बल्कि केबल टीवी के क्षेत्र में सक्रिय टाटा स्काई, डिश और अन्य टीवी जैसे खिलाड़ियों के भी शेयर गिरे हैं क्योंकि रिलायंस जिओ अपने फीचर फोन के साथ एक केबल भी दे रहा है जिससे टीवी से जोड़कर वीडियो प्रोग्रामिंग का मजा भी लिया जा सकता है। इससे पहले एयरटेल और वोडाफोन ने जियो के खिलाफ ट्राई में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन रिलायंस अपनी राह चलती रही क्योंकि एक तो उसे ग्राहकों का समर्थन हासिल था और दूसरा उसे सरकार द्वारा संरक्षण मिलने का भरोसा। नतीजा यह हुआ कि बाकी कंपनियों को भी अपनी कॉल व डाटा दरों में संशोधन करना पड़ा। भारत के संचार बाजार के बारे में यह माना जाता है कि इसमें आगे विस्तार की संभावना काफी सीमित हो चुकी है। देश में इस समय एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन कनैक्शन हैं यानि औसतन हर वयस्क के पास एक मोबाइल फोन है। रिलायंस जियो का असली लक्ष्य फिक्सड लाइन सर्विस है। मुकेश अंबानी ने शेयरधारकों के सवाल का जवाब देते हुए कहाöअब घर और उद्यम, दोनों को फिक्सड लाइन कनेक्टिविटी देने की योजना है। जहां एयरटेल, वोडाफोन व अन्य सर्विस प्रोवाइडर के लिए आगे का समय बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है वहीं रिलायंस ने लगता है तय कर लिया है कि वह इन कंपनियों को तबाह करके छोड़ेगी। रहा सवाल ग्राहकों का तो उनके दोनों हाथों में लड्डू होंगे। मोबाइल और इंटरसेट सेवाएं सस्ती होंगी। बाजार में इस नई स्पर्द्धा से संचार क्षेत्र का यह संकट और गहरा सकता है। कुछ कंपनियों का तो भविष्य ही दाव पर लग गया है।

-अनिल नरेन्द्र

राइट टू प्राइवेसी संविधान के तहत मूल अधिकार है?

निजता मौलिक अधिकार है या नहीं, इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब हमें जल्द मिल जाएगा। देश के सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर गया, जब मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी। अब सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान बेंच तय करेगी कि राइट टू प्राइवेसी संविधान के तहत मूल अधिकार है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने इस मामले को नौ जजों की बेंच को रेफर कर दिया। अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि खटग सिंह और एमपी शर्मा से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो बेंच ने कहा हुआ है कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार नहीं है। 1950 में आठ जजों की संविधान बेंच ने एमपी शर्मा से संबंधित केस में कहा था कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार नहीं है। वहीं 1961 में खटग सिंह से संबंधित केस में सुप्रीम कोर्ट की छह जजों की बेंच ने भी राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं माना। सारा मामला आधार कार्ड को लेकर शुरू हुआ। आधार के लिए जाने वाला डेटा राइट टू प्राइवेसी का उल्लंघन करता है या नहीं, इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान बेंच के सामने यह सवाल आया कि क्या राइट टू प्राइवेसी मूल अधिकार है या नहीं? गौरतलब है कि 23 जुलाई 2015 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राइट टू प्राइवेसी संविधान के तहत मूल अधिकार नहीं है, केंद्र सरकार की ओर से पेश तत्कालीन अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दलील दी थी कि संविधान में पब्लिक के लिए राइट टू प्राइवेसी का प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि राइट टू प्राइवेसी से संबंधित कानून अस्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान याचियों के वकीलों ने दूसरी ओर जोरदार दलीलें पेश कीं। याचियों की ओर से पेश चारों वकीलों का कहना था कि संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों में ही निजता का अधिकार निहित है। अगर निजता को मौलिक अधिकार करार नहीं दिया गया तो बाकी मौलिक अधिकार बेमतलब हो जाएंगे। जीने और स्वतंत्रता के अधिकार प्राकृतिक अधिकारों की श्रेणी में आते हैं और किसी संवैधानिक व्यवस्था के कायम होने के पहले से अस्तित्व में है। संविधान प्रदत्त सभी मौलिक अधिकारों के सन्दर्भ में निजता के अधिकार के बिना जीने के अधिकार का अनुभव नहीं किया जा सकता है। याचियों की ओर से पेश गोपाल सुब्रह्मण्यम ने कहा कि निजता सिर्फ बैडरूम तक सीमित नहीं है बल्कि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है। स्वाधीनता के अधिकार का मतलब निजी पसंद है और इसके लिए निजता का अधिकार जरूरी है। सोली सोराबजी के अनुसार संविधान में प्रेस की आजादी का भी जिक्र नहीं है। यह तर्क के द्वारा निकाला गया है। निजता के अधिकार की भी वही स्थिति है। यह अंतर्निहित है। श्याम दीवान की दलील थी कि निजता में शारीरिक अखंडता भी शामिल है। सिर्फ निरंकुश शासन में ही नागरिक का शरीर उनका अपना नहीं रहता। भारत सरकार की ओर से आधार कार्ड को अनिवार्य किए जाने के बाद तमाम लोगों ने शीर्ष अदालत में याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाओं में कहा गया है कि आधार के लिए बायोमैट्रिक पहचान एकत्र किया जाना और सभी चीजों को आधार से जोड़ना नागरिक की निजता के मौलिक अधिकार का हनन है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी माना कि इस मामले में सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि संविधान में निजता को मौलिक अधिकार माना गया है या नहीं? मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी थी, पहले इसे तय करने की जरूरत है। नहीं तो हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। संविधान बनने के समय राज्य की संस्था इतनी ताकतवर नहीं थी जितनी आज हो गई है, बल्कि आज राज्य से भी आगे बढ़कर बाजार की (मीडिया जैसी) संस्थाएं भी बहुत ताकतवर हो गई हैं। राज्य और बाजार से इतर तमाम संस्थाएं ऐसी हैं जो इन दोनों के इशारों पर काम करती हैं और वे व्यक्ति के निजी जीवन में झांकने और हस्तक्षेप करने की भरपूर शक्ति रखती हैं। इसलिए निजता की रक्षा सिर्फ आधार पर नहीं हो सकती कि भारतीय दंड संहिता और संविधान में तमाम अधिकार दिए गए हैं। हालांकि संविधान निर्माताओं ने निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना था तब शायद उन्हें यह आभास नहीं था कि एक दिन राज्य इतना ताकतवर हो जाएगा और व्यक्ति इतना कमजोर। हालांकि महात्मा गांधी राज्य को कमजोर करने और नागरिक को ताकतवर बनाने के पक्षधर थे। महात्मा गांधी समझते थे कि राज्य विकसित होंगे तो हिंसा बहुत कम होगी। लेकिन आज हिंसा से न सिर्फ राज्य की संस्थाएं ही असुरक्षित हैं बल्कि नागरिक भी बेहद असुरक्षित हैं। राज्य ने इसी असुरक्षा को घटाने और सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए अपने पास असीमित अधिकार ले रखे हैं। यह बहस चलनी चाहिए कि सामाजिक सुरक्षा सामाजिक न्याय देने से बढ़ेगी या कड़े कानून बनने से। प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहाöनिजता का अधिकार अस्पष्ट तौर पर परिभाषित अधिकार है और यह पूरी तरह नहीं मिल सकता। यह स्वतंत्रता का एक छोटा-सा हिस्सा है। पीठ ने उदाहरण देकर समझाया कि बच्चे को जन्म देना निजता के अधिकार के दायरे में आ सकता है और माता-पिता यह नहीं कह सकते कि सरकार के पास यह अधिकार नहीं है कि वह हर बच्चे को स्कूल भेजने का निर्देश दे।

Sunday, 23 July 2017

आतंकियों की सुरक्षित पनाहगाह पाकिस्तान

आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरने की भारत की मुहिम को बुधवार को बड़ी सफलता मिली। अमेरिका ने आखिरकार पाकिस्तान को आतंकवाद का संरक्षक देश घोषित कर ही दिया। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्टö`कंट्री रिपोर्ट ऑन टेरेरिज्म' में कहा गया है कि लश्कर--तैयबा, जैश--मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन पाकिस्तान से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। यह संगठन वहां आतंकवादियों को प्रशिक्षण देते हैं, हमले संचालित कराते हैं और खुलेआम चन्दा जुटाते हैं। यही आरोप भारत बार-बार लगाता रहा है और अब अमेरिका ने इनकी पुष्टि कर दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं। इनमें पाक स्थित आतंकी संगठनों और नक्सलियों द्वारा किए जाने वाले हमले शामिल हैं। भारत जम्मू-कश्मीर में होने वाले आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार बताता रहा है। जनवरी में भारत के पठानकोट स्थित सैन्य ठिकाने पर आतंकी हमला हुआ था। भारत ने इसका आरोप जैश--मोहम्मद पर लगाया। 2016 में भारत सरकार ने अमेरिका के साथ आतंकवाद रोधी सहयोग को गहरा बनाने और सूचनाएं साझा करने का प्रयास किया है। भारत सरकार आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन और भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा के खतरे पर भी करीबी नजर रख रही है। यह संगठन अपने आतंकी प्रोपेगंडा के जरिये भारत को धमकी देते रहे हैं। भारत में आईएसआईएस से जुड़े और हमले की साजिश रचने के आरोप में कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं। मुंबई आतंकी हमले का मास्टर माइंड और संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी घोषित हाफिज सईद पाक में अब भी रैलियां कर रहा है। जबकि फरवरी 2017 में पाकिस्तान ने आतंकवाद निरोधक कानून के तहत उसे प्रतिबंधित कर रखा है। अमेरिका द्वारा आतंक के पनाहगाह देशों की सूची में शामिल होने वाला पाक 13वां देश है। इस सूची में अफगानिस्तान, सोमालियाद ट्रांस सहारा, सुल-सुलवेसी सीस लिटाराल, दक्षिण फिलीपींस, मिस्र, इराक, लेबनान, लीबिया, यमन, कोलंबिया और वेनेजुएला शामिल हैं। हालांकि अमेरिकी कदम से पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का दबाव जरूर बढ़ेगा। लेकिन इससे पाक पूरी तरह आतंकवाद पर नकेल कस देगा, इसमें संदेह है। दरअसल अमेरिकी कांग्रेस पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के पक्ष में थी, लेकिन ट्रंप सरकार ने दो कदम आगे और एक कदम पीछे का कूटनीतिक संकेत दिया है। अब यह देखना होगा कि पाक अमेरिका के दबाव में कितना आता है। पाक को आतंक की पनाहगाह घोषित करके अमेरिका ने राजनयिक व कूटनीतिक रिश्तों का रास्ता खोले रखा है ताकि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई की गुंजाइश बनी रहे। देखना होगा कि पाक अब लश्कर व जैश पर कितनी विश्वसनीय कार्रवाई करता है?

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 22 July 2017

रायसीना हिल पर राम

बेशक भाजपा के रामनाथ कोविंद देश के चौदहवें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं और उनकी जीत निश्चित भी थी पर उन्हें सिर्फ 65.65 प्रतिशत वोट ही मिले। यह 44 साल में किसी राष्ट्रपति को मिला सबसे कम वोट शेयर भी है। इससे पहले 1974 में कांग्रेस के फखरुद्दीन अहमद को 56.23 प्रतिशत वोट मिले थे। कोविंद 25 जुलाई को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। उनको जीत भले ही कम वोट से मिली हो पर वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुन लिए जाने के बाद भाजपा को पहली बार अपना राष्ट्रपति मिला है और भाजपा 33 साल पहले कांग्रेस जितनी मजबूत हो जाएगी। यह पहला मौका होगा जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भाजपा के होंगे। लोकसभा में बहुमत भी है और 17 राज्यों में उसकी सरकार भी है। 1984 में 404 सीटें जीतकर राजीव गांधी ने कांग्रेस की सरकार बनाई थी। तब 17 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और उपराष्ट्रपति वेंकटरमण भी कांग्रेसी थे। रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश मूल के पहले राष्ट्रपति हैं। इसके पहले देश में 13 राष्ट्रपति हुए। इनमें तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन जरूर उत्तर प्रदेश के थे लेकिन मूल रूप से वह आंध्रप्रदेश के हैदराबाद में एक बड़े जमींदार परिवार में जन्मे थे। अखबार पढ़ने वालों या टीवी देखने वालों के लिए भले ही रामनाथ कोविंद का नाम ज्यादा परिचित न रहा हो, पर भाजपा के विश्वासपात्र को खबरों में रहना पसंद नहीं और वह लो-प्रोफाइल व्यक्ति रहे हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के फारुख गांव स्थित उनके पैतृक आवास में जश्न का माहौल होना स्वाभाविक है। कोविंद 71 वर्षीय राष्ट्रपति निर्वाचित होने वाले भाजपा के प्रथम सदस्य और दूसरे दलित नेता हैं। यूपी के दलित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद को देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचाकर भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के लिए सामाजिक समीकरणों की जमीन भी तैयार करने का प्रयास किया है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति कोविंद अब भले ही भाजपा के सक्रिय नेता न रहे हों, लेकिन वह परोक्ष रूप से भाजपा के सबसे बड़े दलित चेहरा बन गए हैं। भाजपा की चुनावी रणनीति में दलित व पिछड़ा समीकरण सबसे ऊपर है। दोनों सर्वोच्च पदों पर दलित व पिछड़े वर्ग के नेता उनकी नई पहचान बनते जा रहे हैं। रामनाथ कोविंद के लिए बेशक यह जीत आसान थी पर आगे की चुनौतियां निश्चित तौर पर उतनी आसान नहीं होंगी। सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि उन्हें राजनीति के मंजे हुए विद्वान नेता प्रणब मुखर्जी की जगह लेनी है। पांच साल के पूरे कार्यकाल में ऐसा मौका शायद नहीं ही आया, जब प्रणब मुखर्जी के किसी फैसले पर अंगुली उठाने का मौका मिला हो, जबकि वह एक ऐसे दौर में राष्ट्रपति रहे, जब देश में एक बहुत बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ। इस पूरे दौर में उन्होंने न सिर्फ एक आदर्श राष्ट्रपति की छवि पेश की बल्कि जहां जरूरत पड़ी, सरकार को चेताने का काम भी किया। लेकिन रामनाथ कोविंद का पूरा राजनीतिक सफर जिस तरह से निर्विवाद रहा है, उसे देखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं कि वह इन चुनौतियों पर खरे उतरेंगे और चुनौतियां कोविंद के लिए भी कम नहीं होंगी। सबसे अहम मुद्दा जो निकट भविष्य में सामने आएगा वह है अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है। अदालत कह चुकी है कि दोनों पक्षों को कोर्ट से बाहर समझौता कर लेना चाहिए। हालांकि फिलहाल तो इसकी कोई संभावना नजर नहीं आ रही। अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अगर भाजपा की उम्मीदों के पलट कोई फैसला दिया तो सरकार उसके अनुसार कोई संवैधानिक कदम उठा सकती है। ऐसे में राष्ट्रपति भवन बड़ा सहारा होगा। भाजपा धर्म के आधार पर सिविल कोड का शुरू से ही विरोध करती आ रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ट्रिपल तलाक बड़ा मुद्दा बना था। इस मामले में 2019 के चुनाव से पहले कोई बिल लाया जा सकता है। लोकसभा में भाजपा का बहुमत है पर राज्यसभा में 49 वोट कम पड़ेंगे। अगर राज्यसभा में वेंकैया सहयोगी दलों के समर्थन से बिल पास करवाने में सक्षम हुए तो राष्ट्रपति भी कोई अड़चन पैदा नहीं करेंगे। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के मामले में कोई मुद्दा नहीं होता पर इस पद के लिए दोनों उम्मीदवारों का दलित वर्ग से होने से दलितों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। पर राष्ट्रपति कोविंद पूरे देश के मुखिया हैं, किसी वर्ग विशेष के नहीं इसलिए उन्हें सिर्फ दलित वर्ग के नेता के रूप में अब नहीं देखा जा सकता। लेकिन फिर भी उनके राष्ट्रपति बनने से एक फर्क तो पड़ेगा ही, देश का दलित वर्ग इसमें अपनी सशक्तिकरण की झलक देखेगा। उसका भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास और पुख्ता जरूर होगा। ग्रामीण आंचल से एक गरीब परिवार व दलित वर्ग का व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच जाए यह भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में ही संभव है। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्री रामनाथ कोविंद अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह पद की गरिमा और संवैधानिक तकाजों के अनुरूप ही करेंगे। हम श्री कोविंद को भारत के चौदहवें राष्ट्रपति बनने पर हार्दिक बधाई देते हैं।

अब पाक स्कूली बच्चों को निशाना बना रहा है

पाकिस्तानी सेना ने अब सारी हदें पार कर दी हैं। अब वह हमारे बच्चों पर भी निशाना साधने लगे है। सोमवार को एक बार फिर पाक सेना ने पुंछ और राजौरी जिलों में गोलाबारी की, जिसमें एक छह साल की बच्ची साजिदा कफील की जान चली गई और एक भारतीय जवान मुदस्सर अहमद शहीद हो गए। पाक फायरिंग में जिला राजौरी के नौशेरा सब-डिवीजन में एलओसी से सटे दो स्कूलों के 217 बच्चे 10 घंटे तक फंसे रहे। 15 शिक्षक भी स्कूल में ही बंद रहे। पाकिस्तानी सेना ने फिर मंगलवार को भारी गोलाबारी कर स्कूल के बच्चों को निशाना बनाया। डीसी राजौरी
डॉ. शाहिद इकबाल चौधरी के अनुसार भवानी स्कूल में 150 बच्चे व सैर स्कूल में 55 बच्चे करीब 10 घंटे तक पाक गोलाबारी के चलते स्कूल के कमरे में ही बंदी बने रहे। घंटों बाद जब फायरिंग थोड़ी कम हुई तो बच्चों का स्कूलों से निकालना शुरू हुआ। रेस्क्यू टीम ने सभी 217 बच्चों व 15 शिक्षकों को सुरक्षित निकाला। गर्मियों की छुट्टी के बाद सभी बच्चे सीजन में पहली बार स्कूल पहुंचे थे। स्कूल काफी ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम काफी मुश्किल हो गया। पाक की अंधाधुंध फायरिंग के दौरान बुलेटप्रूफ वाहनों में छात्रों को स्कूल से बाहर निकाला गया। बच्चों के माता-पिता ने बताया कि जब खबर मिली कि बच्चों के स्कूलों पर मोर्टार शेल पड़ रहे हैं तो सांसें अटक गईं। न बाहर निकलना संभव था और न ही घर बैठना पर बच्चों का हाल जानना जरूरी था। शाम छह बजे बच्चों को अपनी आंखों से सलामत देखा तो उनके मुंह में कुछ डालकर खुद भी खाया। अभिभावकों ने रोष प्रकट करते हुए कहा कि अब हम कब तक यूं ही मौत के साये में जीते रहेंगे? सवाल यह है कि पाकिस्तान इतनी ओछी हरकत आखिर कर क्यों रहा है? उसे मालूम होगा कि वह स्कूलों पर गोलाबारी कर रहा है और इसमें बच्चे मारे जा सकते हैं। क्या पाकिस्तान अब अपनी दुश्मनी नन्हें बच्चों से निकालेगा? उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय सेना उसकी इस गिरी हुई हरकत का माकूल जवाब दे सकती है। पर भारतीय सेना ऐसी ओछी हरकतों पर विश्वास नहीं करती। ऐसी हरकतें करने से पाकिस्तान खुद ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रहा है। जब सारी दुनिया को पता चलेगा कि जानबूझ कर, सोची-समझी रणनीति के तहत पाकिस्तानी सेना स्कूली बच्चों को निशाना बना रही है तो उसकी पहले से गिरती छवि को और बट्टा लगेगा। पाकिस्तानी सेना में अगर थोड़ी-सी भी इंसानियत बची है तो बच्चों को निशाना न बनाए। लड़ना है तो उनसे लड़े जो माकूल जवाब देने में सक्षम हैं।


-अनिल नरेन्द्र