Thursday, 24 May 2018

...और अब चमगादड़ से फैलने वाला निपाह वायरस

आजकल हम अजीबो-गरीब वायरसों के बारे में सुन रहे हैं। मैंने तो कम से कम ऐसे वायरस के बारे में नहीं सुना। देश में पहली बार आए मलेशियाई वायरस निपाह ने केरल में नौ लोगों की जान ले ली है। केरल के कोझिकोड जिले में सिरदर्द व तेज बुखार के बाद एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई। उनकी देखभाल करने वाली नर्स की भी सोमवार सुबह मौत हो गई। मलप्पुरम जिले में भी इन्हीं लक्षणों के साथ पांच लोगों के मरने की सूचना है। जानवरों से फैलने वाला यह वायरस चमगाद़ड़ के जरिये फैला है। फ्रूट बैट कहा जाने वाला चमगादड़ मुख्यत फल या फल के रस का सेवन करता है। निपाह वायरस जानवरों से आदमियों में फैलने वाला एक नया संक्रमण है। यह इंसानों और जानवरों को गंभीर रूप से बीमार कर देता है। कोझिकोड के जिस परिवार में इस वायरस से तीन लोगों की मौत हुई है और कुछ अन्य का इलाज चल रहा है, उनके घर के कुएं में यह फ्रूट बैट मिला है। स्वास्थ्य मंत्री केके शिलाजा ने कहा कि अब यह कुआं बंद कर दिया गया है। इस वायरस की सबसे पहले पहचान 1998 में मलेशिया में हुई। उस वक्त यह सूअरों में फैला था। यह संक्रमित चमगादड़ द्वारा खाए गए फल खाने से फैलता है। यह संक्रमण फ्रूट बैट प्रजाति के चमगादड़ से तेजी से फैलाता है। इसकी वजह यह है कि यह एकमात्र स्तनधारी है जो उड़ सकता है। यह पेड़ पर लगे फलों को खाकर उसे संक्रमित कर देता है। जब पेड़ से गिरे इन संक्रमित फलों को इंसान खा लेता है तो वह इस बीमारी की चपेट में आ जाता है। इस बीमारी के लक्षण कुछ ऐसे होते हैंöधुंधला दिखना, सांस में तकलीफ, एनसेफलाटिस जैसे अन्य लक्षण। सिर में लगातार दर्द रहना, चक्कर आना। बचने के उपायöपेड़ से गिरे फल न खाएं। जानवरों के निशान हों तो ऐसी सब्जियां न खरीदें। जहां चमगादड़ अधिक रहते हैं वहां खजूर खाने से परहेज करें। संक्रमित रोगी, जानवरों के पास न जाएं। फिलहाल निपाह वायरस से संक्रमण का कोई इलाज नहीं है। एक बार संक्रमण फैल जाने पर मरीज 24 से 48 घंटे तक कोमा में जा सकता है और मौत तक संभव है। इसलिए आप अपना ध्यान रखें और जहां चमगादड़ हों वहां के फ्रूट-सब्जी खाने से बचें।

-अनिल नरेन्द्र

कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में विपक्षी एकता का संदेश?

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी एकता दिखाने का एक अवसर मिल गया। बेंगलुरु में बुधवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में सभी विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और बसपा अध्यक्ष मायावती प्रमुख नेता हैं जो शामिल हुए। दरअसल कर्नाटक की कुश्ती में भाजपा को मिली मात प्रकरण से तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, चन्द्रबाबू नायडू तथा तेलंगाना के नेताओं की बांछें खिलने लगी हैं। कर्नाटक के घटनाक्रम से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि भाजपा के सामने एकजुट होकर चुनाव लड़ने से ही सत्ता हासिल होगी। साथ ही राजग के कुछ घटक दल भी तीसरे मोर्चे में शामिल हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि श्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह को लोकसभा के नजरिये से देखा जाए तो समारोह में जिन दलों को न्यौता दिया गया, वह लोकसभा की 270 से अधिक सीटों पर मजबूत दावेदारी रखते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ के दौरे में संपादकों से बातचीत में यह पूछे जाने पर कि क्या वह 2019 में मोदी के खिलाफ जीत हासिल कर पाएंगे तो राहुल ने जवाब दिया कि विपक्ष अगर एकजुट हो जाएगा तो वह दिन निश्चित रूप से आएगा। विपक्ष के गठबंधन का नेतृत्व क्या वह करेंगे, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस सामने वाली पार्टी की विचारधारा का सम्मान करती है जबकि भाजपा अपनी विचारधारा को मानने को मजबूर करती है। 2019 में अगर भाजपा बनाम विपक्ष में वन टू वन फाइट होती है तो भाजपा को हराया जा सकता है। दूसरी ओर कर्नाटक में जिस तरह कांग्रेस ने जेडीएस जैसे छोटे क्षेत्रीय दल का जूनियर पार्टनर बनना स्वीकार किया है, उससे तो यही जाहिर होता है कि कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों के पिछलग्गू की भूमिका निभानी पड़ सकती है। कांग्रेस ने बहुत भारी भूल की कर्नाटक में। नतीजे बताते हैं कि अगर कांग्रेस ने जेडीएस से चुनाव पूर्व गठबंधन यानि प्री-पोल एलायंस किया होता तो न तो गवर्नर येदियुरप्पा को पहले बुलाते और न ही इतना हंगामा होता। अगर प्री-पोल एलायंस होता तो कर्नाटक की 224 से 157 सीटों पर गठबंधन की जीत होती यानि भाजपा को महज 65 सीटों पर सिमटना पड़ता। इन्हीं नतीजों को अगर लोकसभा के स्तर पर देखा जाए तो भाजपा कर्नाटक की 28 सीटों में 10 सीटें ही जीत पाएगी। ममता बनर्जी और मायावती ने कांग्रेस को जेडीएस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन की सलाह दी थी तब सिद्धारमैया को कन्नड़ और लिंगायत कार्ड की बदौलत जीतने का पूरा भरोसा दिया था। कर्नाटक के नतीजों ने सिद्धारमैया का अहंकार तो तोड़ा ही साथ-साथ जीती हुई बाजी हाथ से निकाल दी।

Wednesday, 23 May 2018

कर्नाटक फॉर्मूले पर 5 राज्यों में सरकार बनाने का मौका?

 कर्नाटक में बहुमत वाले कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के बजाय 104 विधायकों वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए न्यौता देकर गवर्नर वजुभाई वाला ने एक नई समस्या खड़ी कर दी है। उनके इस फैसले का असर अन्य राज्यों में भी दिखना शुरू हो गया है। शुक्रवार को कांग्रेस ने गोवा, मणिपुर व मेघालय, राजद ने बिहार और एनपीएफ ने नागालैंड में सबसे बड़ा दल होने के नाते सरकार बनाने का मौका देने की मांग कर डाली। कर्नाटक में सरकार बनाने के फैसले व न्यौते के पूरे घटनाक्रम का सीधा असर देश के इन पांच राज्यों पर पड़ा है। बिहार में राजद नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, कांग्रेस, हम और माले नेताओं के साथ राजभवन पहुंचे। उन्होंने राज्यपाल सत्यपाल मलिक के समक्ष बिहार में सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्यपाल ने प्रतिनिधिमंडल को मामले पर विचार करने का आश्वासन दिया। तेजस्वी ने बताया कि उन्होंने महामहिम से मुलाकात कर विधायकों का समर्थन पत्र सौंपा। उन्होंने दावा किया कि राजद, कांग्रेस, हम और माले के 111 विधायक हैं। इसके अलावा जदयू के कई विधायक उनके सम्पर्प में हैं। फ्लोर टेस्ट का मौका मिलने पर वह आसानी से अपना बहुमत साबित कर देंगे। बिहार में राजद के 50, कांग्रेस के 27 विधायक हैं जबकि जदयू के 71 और भाजपा के 53 विधायक हैं। मणिपुर कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने कार्यवाहक राज्यपाल जगदीश मुखी से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता के जयकिशन सिंह ने बताया कि कांग्रेस विधायक दल के 9 नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह की अगुवाई में राज्यपाल से मुलाकात की। मणिपुर में कांग्रेस के 28, भाजपा के 21 तथा अन्य के 7 विधायक हैं। मेघालय में कांग्रेस की ओर से मुकुल संगमा ने राज्यपाल गंगा प्रसाद से मुलाकात की और राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश किया। राज्य में कांग्रेस 21 विधायकों के साथ सबसे बड़ा दल है, लेकिन भाजपा ने 20 विधायकों वाली एनपीपी को समर्थन दिया। साथ ही अन्य 17 का समर्थन हासिल करने में भी मदद की। नतीजतन राज्य में कांग्रेस सत्ता नहीं हासिल कर सकी। उधर गोवा में भी कांग्रेस 17 विधायकों के साथ सबसे बड़ा दल है। अन्य 7, भाजपा 13 और निर्दलीय 3 हैं। बड़ी पार्टी होने के नाते उन्हें भी सरकार बनाकर बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए। कांग्रेस ने राज्यपाल मृदुला सिन्हा को आग्रह पर विचार करने के लिए 7 दिन का समय दिया है। इस दौरान कांग्रेस के 14 विधायक मौजूद थे। नागालैंड में सबसे बड़ी पार्टी एनपीएफ ने भी सरकार बनाने का दावा पेश किया। उनके प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल पीवी आचार्य से मुलाकात कर पत्र सौंपा। राज्य विधानसभा चुनाव में एनपीएफ ने 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि भाजपा को 18 सीटें मिली थीं। वहीं एनडीपीपी को 18 और अन्य को चार सीटों पर जीत मिली। जैसा मैंने कहा कि कर्नाटक के राज्यपाल के एक फैसले ने नई समस्या खड़ी कर दी है।
-अनिल नरेन्द्र



जम्मू में सीमावर्ती हिन्दुओं की दुर्दशा

आए दिन हमें यह बताया जाता है कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना के करारे-मुंहतोड़ जवाब से पाकिस्तान में त्राहि-त्राहि मच गई है और पाकिस्तानी रेंजर्स बीएसएफ अधिकारियों से अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। बेशक यह सही भी हो पर फिर उसी दिन रात को पाक की तरफ से फिर फायरिंग आरंभ हो जाती है, इसका क्या मतलब? इस साल पाकिस्तान ने अभी तक जम्मू-कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर 700 बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया है। इससे सुरक्षाबलों के 18 जवानों सहित 38 लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों लोग अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए हैं। जम्मू क्षेत्र में तो पाक गोलाबारी से इतनी तबाही हो रही है जिसका कोई हिसाब नहीं। जम्मू-कश्मीर में भाजपा की महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ सरकार है। पाकिस्तानी सैनिकों ने कल यानि सोमवार को जम्मू जिले में सीमावर्ती गांवों को मोर्टार के गोलों व छोटे हथियारों से निशाना बनाया जिससे आठ महीने के एक बच्चे की मौत हो गई और एक विशेष पुलिस अधिकारी सहित छह लोग घायल हो गए। मैंने कल एक वीडियो क्लिप देखा जिसमें जम्मू के सीमावर्ती गांव में बमबारी के कारण एक नौजवान की मौत हो गई और उसके भाई ने क्लिप में बताया कि वह अपने भाई और दूसरे मृत गांव वालों की लाशें ट्रैक्टरों पर लाने पर मजबूर हुए। क्या सरकार इन्हें इतनी-सी भी सुविधा नहीं दे सकती? भाजपा को जितने भी वोट मिले वह जम्मू क्षेत्र से ही मिले। आज अगर वह जम्मू-कश्मीर में सत्ता में है तो जम्मू के हिन्दुओं की वजह से है। भाजपा ने जम्मू के हिन्दुओं की सुरक्षा व विकास के लिए आखिर क्या किया है? आज स्थिति इतनी खराब हो गई है कि जम्मू से हिन्दुओं का देश के अन्य भागों में पलायन शुरू हो गया है। वह मजबूर हो गए हैं कि अपने घर-बार को छोड़कर, बच्चों को लेकर दिल्ली व चंडीगढ़ या भारत के अन्य भागों में जा बसें। क्या इस दिन के लिए जम्मू के हिन्दुओं ने भाजपा को वोट दिया था? विकास तो छोड़िए उनकी सुरक्षा तक नहीं हो सकती। राज्य में भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के सामने जैसे घुटने टेक दिए हैं। भाजपा ने रमजान के दौरान सीजफायर के फैसले पर अपनी मुहर क्यों लगा दी? जब सेना कहती रही कि हम इस तरह के एकतरफा सीजफायर के खिलाफ हैं पर भाजपा ने एक नहीं सुनी। क्या जम्मू-कश्मीर में भारतीय सैनिकों की जान की कोई कीमत नहीं? नरेंद्र मोदी के जम्मू-कश्मीर दौरे से ठीक पहले केंद्र सरकार ने कश्मीर में सीजफायर का फैसला किया। इसके तहत रमजान के पवित्र महीने के दौरान राज्य में आतंकियों के खिलाफ सेना अपना अभियान स्थगित रखेगी। इधर केंद्र ने कहाöरमजान में बंदूकें बंद रहेंगी। उधर शोपियां जिले में सुरक्षाबलों पर अटैक हुआ। त्राल में सेना की पेट्रोलिंग पार्टी पर आतंकियों ने बम फेंका। सेना जब आतंकियों को मारने के लिए घेरती है तो कश्मीरी युवा उन पर पत्थर मारते हैं, थूकते हैं और सेना बर्दाश्त करती है। पीठ पर हाथ बांधकर आप सेना को कैसे लड़ने को कह सकते हैं? क्या हमारे सैनिकों के जीवन की कोई कीमत नहीं है? आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? इससे बेहतर तो यह है कि भाजपा जम्मू-कश्मीर गठबंधन से अलग हो और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर राज्य को सेना के हवाले कर दिया जाए। भाजपा को याद रखना चाहिए कि वह इन हिन्दुओं के वोटों से ही सत्ता में आई है। आज उन्हीं हिन्दुओं की सुरक्षा व विकास करने में असफल रही है वह भी एक अलगाववादी प्रवृत्ति की मुख्यमंत्री के लिए?

Tuesday, 22 May 2018

राज्यपाल के विवेकाधिकार की समीक्षा जरूरी है

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सुनवाई के दौरान बेबाक टिप्पणी की कि राज्यपाल के विवेकाधिकार की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए और बेशक वह संविधान की उच्चतर संस्था है। लेकिन उनकी कार्रवाई को देखा जाएगा कि वे कानूनी रूप से वैध है या नहीं? जस्टिस एके सीकरी की अध्यक्षता वाली तीन जजों की विशेष पीठ ने कहा कि यह वृहत्तर मुद्दा है और इसकी सुनवाई 10 हफ्ते बाद होगी। पीठ ने टिप्पणियां वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद राम जेठमलानी की याचिका पर की। याचिका में जेठमलानी ने कहा कि सर्वोच्च अदालत को इस मामले में व्यवस्था देनी चाहिए क्योंकि राज्यपाल ने ऐसे तरीके से काम किया है जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। पीठ ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाने के मामले में किसी अन्य को पक्ष बनने की अनुमति नहीं दी जाएगी। लेकिन पीठ जेठमलानी को सुनने के लिए तैयार हो गई। जेठमलानी ने पीठ के अन्य दो जजोंöजस्टिस भूषण और बोब्डे से भी अनुमति मांगी और उसके बाद कहा कि राज्यपाल का आदेश संविधानिक शक्तियों का भयानक दुरुपयोग है, इससे संवैधानिक कार्यालय बदनाम हुआ है। भाजपा ने जो कहा उन्होंने वही मूर्खतापूर्ण कार्रवाई कर दी। राज्यपाल का आदेश भ्रष्टाचार को खुला आमंत्रण है। कर्नाटक मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां तथ्य खुद बोल रहे हों वहां विवेकाधिकार नहीं होना चाहिए। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा ने राज्यपाल वजुभाई वाला को लिखे पत्र में बहुमत का दावा किया था। इस पर बैंच ने पूछा कि क्या आप वह पत्र लाए हैं? वेणुगोपाल ने कहा कि यह पत्र रोहतगी के पास है। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव बाद हुए गठबंधन का स्थान सबसे बड़े दल से नीचे होता है। कांग्रेस-जद (एस) की याचिका की सुनवाई कर रही पीठ के न्यायाधीश जस्टिस एके सीकरी ने कहा कि सरकारिया आयोग की सिफारिशों के मुताबिक सबसे बड़े दल को राज्यपाल सरकार बनाने के लिए बुलाएंंगे। अगर उस दल के पास बहुमत है तो कोई समस्या नहीं है। अगर बहुमत न हो तो दो स्थितियां होती हैंöचुनाव पूर्व गठबंधन और चुनाव बाद का गठबंधन। चुनाव पूर्व गठबंधन के पास अगर बहुमत है तो सरकार बनाने के लिए बुलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि हालांकि चुनाव बाद के गठबंधन की स्थिति वह नहीं होती जो चुनाव पूर्ण गठबंधन की होती है। हम सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत करते हैं। राज्यपाल कभी-कभी पक्षपातपूर्ण फैसले करते हैं जो अलोकतांत्रिक होते हैं। संविधान में भी राज्यपाल के अधिकारों का विश्लेषण नहीं है, इसलिए बेहतर है कि सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल के अधिकारों को परिभाषित करे। यह विवेकाधिकार समाप्त होना चाहिए।

-अनिल नरेन्द्र

कांग्रेस की किलेबंदी ने मोदी-शाह की रणनीति पर पानी फेर दिया

कर्नाटक मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सियासी गुगली ने राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के किए-कराए पर पानी फेर दिया। उनकी रणनीति को बखूबी अंजाम दिया उनके दो वरिष्ठ सिपहसालारोंöगुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत ने। राज्य में भाजपा को सत्ता पाने से रोकने के राहुल के प्लान ने दो स्पष्ट संकेत दिए। पहला कि भाजपा को हराया जा सकता है। दूसरा कि अगर विपक्ष एक हो जाए तो वह सत्ता की बाजी जीत सकता है। अतीत की गलतियों से सीख लेते हुए इस बार चुनाव परिणाम से पहले ही पूरी तैयारी कर ली गई थी और सभी को इस अनुरूप जिम्मेदारी भी सौंप दी गई थी। कांग्रेस खराब मैनेजमेंट के कारण हाल के दिनों में कई बार सत्ता के करीब पहुंचने के बाद भी सरकार बनाने में विफल रही है। इस बार वह यह नहीं दोहराना चाहती थी, इसलिए पहले से ही पूरी तैयार कर ली गई। आखिरकार शनिवार को जब कांग्रेस को अपनी रणनीति में कामयाबी मिली तब पार्टी नेताओं ने राहत की सांस ली। पार्टी ने परिणाम से पहले ही तमाम संभावनाओं के मद्देनजर तैयारी के बाद सोमवार देर रात ही अचानक ही अशोक गहलोत और गुलाम नबी आजाद को बेंगलुरु भेजा ताकि वे प्लान बी के साथ तैयार रहें। देर शाम वे वहां पहुंच चुके थे। चुनाव परिणाम आधिकारिक रूप से घोषित होने से पहले ही कांग्रेस का बिना संकोच जेडीएस को समर्थन देना स्पष्ट संकेत दे रहा था कि इस चुनाव में कांग्रेस अल्पमत में आने के बावजूद पूरी रणनीति से काम कर रही थी। प्लान बी के तहत पार्टी ने बिना किसी आधिकारिक शर्त के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने पर समर्थन दे दिया। यह भी खास बात थी कि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कर्नाटक में कांग्रेस पहली बार चुनाव लड़ रही थी। चुनाव के पहले राहुल गांधी सिलसिलेवार जनसभाएं करते रहे, जबकि चुनाव के बाद तीनों रणनीतिकारों ने सामने आकर मैदान संभाल लिया। बिसात बिछाने के साथ पूरी रणनीति सोनिया गांधी को बताई जा रही थी। सोनिया लगातार इन तीनों नेताओं को निर्देश दे रही थीं। जब गवर्नर ने कांग्रेस को दरकिनार करते हुए भाजपा को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया तो अभिषेक मनु सिंघवी ने कानूनी तौर पर मोर्चा संभाला। सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इसे इस स्तर पर लेकर आए कि सर्वोच्च न्यायालय को आधी रात में सुनवाई करनी पड़ी। इस कानूनी लड़ाई में कपिल सिब्बल और पी. चिदम्बरम भी उनके साथ थे। नतीजों के बाद चली उठापटक में कुमारस्वामी जब राज्यपाल से मिलने पहुंचे तो उनके साथ आजाद, अशोक गहलोत और मल्लिकार्जुन खड़गे मौजूद थे। मंगलवार रात कांग्रेसी नेताओं ने बेंगलुरु के होटल में देवेगौड़ा और कुमारस्वामी से मुलाकात की, जहां आजाद भी ठहरे हुए थे। बताया जाता है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डी. शिवकुमार भी होटल में मौजूद थे। इस मौजूदगी का ही परिणाम था कि जब कर्नाटक में भाजपा की सरकार गिर चुकी थी और जिसे कांग्रेस की अतिसक्रियता और विशेष रणनीति का नतीजा बताया जा रहा है। कर्नाटक से पहले गुजरात में राज्यसभा सांसद के चुनाव के दौरान भी अमित शाह की रणनीति को असफलता हाथ लगी थी, तब कांग्रेस के खेवनहार सोनिया गांधी के करीबी रहे अहमद पटेल बने थे। गुजरात चुनाव के दौरान अगर अहमद पटेल पार्टी के संकटमोचक बने तो कर्नाटक में गुलाम नबी आजाद, अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खड़गे और डी. शिवकुमार पार्टी के संकटमोचक बने। उन्होंने कर्नाटक के फ्लोर टैस्ट से पहले तक कांग्रेसी विधायकों को टूटने से बचाए रखा। इन नेताओं ने सुनिश्चित किया कि कोई भी विधायक टूटे नहीं। ममता बनर्जी, मायावती और सीताराम येचुरी ने भी इस मामले में इनपुट दिए वहीं टीडीपी और टीआरएस भी कांग्रेस के इन शीर्ष नेताओं से लगातार सम्पर्प में थे। इस तरह सब ने मिलकर मोदी-शाह की रणनीति को मात दी।

Sunday, 20 May 2018

जहां रोज 100 किमी रफ्तार के 4 से 6 तूफान आते हैं

आंधी-तूफान ने रविवार को देश के उत्तर से लेकर दक्षिणी और पूर्व से लेकर पश्चिमी हिस्सों में तबाही मचाई। दिल्ली में 109 किलोमीटर की रफ्तार से आंधी चली। 24 घंटे के दौरान आंधी-तूफान और बारिश की वजह से हुए हादसों में छह राज्यों में 50 से ज्यादा लोग मारे गए, सैकड़ों पेड़ गिर गए, कई घर तबाह हो गए। हवा की रफ्तार की बात करें तो दैनिक भास्कर में मैंने एक दिलचस्प रिपोर्ट पढ़ी। इस साल दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट एवरेस्ट पर जाने के लिए भारत की आठ महिलाओं को परमिट मिला है। इन आठ में एक मध्यप्रदेश की मेघा परमार भी हैं। मेघा अभी सफर में हैं। करीब 23 हजार फुट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी हैं। 15 मई के आसपास वह 29 हजार फुट ऊंचाई वाले शिखर के लिए निकलेंगी। यह रिपोर्ट एवरेस्ट के रास्ते से उन्होंने भेजी है। रविवार दोपहर तीन बजकर 30 मिनट पर। मैं माउंट एवरेस्ट के कैंप दो यानि 21 हजार फुट पर हूं। तापमान माइनस 18 डिग्री है। तीन घंटे पहले आए बर्फीले तूफान से बचने के लिए हम कैंप के अंदर बैठे हैं। बाहर करीब 100 किलोमीटर की रफ्तार से बर्फीली हवाएं चल रही हैं लेकिन मुझे अपने गांव की मिट्टी को चोटी तक पहुंचाना है। यहां रोज चार से छह बर्फीले तूफान आते हैं। कई बार तो बर्प के बड़े टुकड़े भी खिसक आते हैं। ऐसे तूफान दिन में ज्यादा आते हैं। इसलिए चढ़ाई रात दो बजे के बाद करते हैं। हम लोग प्रेस्टीज एडवेंचर ग्रुप के साथ हैं और मेरे अलावा इसमें ईरान से मेहर दादशहलाए, इटली की मार्को जाफरोनी और पोलैंड की पावेल स्टम्पनिस्वस्की हैं। पिछले सप्ताह जब हम कैंप दो से तीन के बीच सीधी पहाड़ी पर चढ़ रहे थे तब रात दो बजे तेज हवाएं हमारा रास्ता रोक रही थीं और आठ घंटे लगातार सीधी चढ़ाई के बाद हम कैंप तीन पर पहुंचे थे। कैंप दो से तीन के बीच पीठ पर बंधा ऑक्सीजन सिलेंडर हमेशा सांस लेने में मदद करता है। कैंप तीन से आने के बाद भी हम लगातार यहां आसपास मौजूद छोटी-छोटी पहाड़ियों पर चढ़ने की प्रैक्टिस करते रहते हैं ताकि एनर्जी बनी रहे। बेस कैंप से शिखर तक कुल चार कैंप हैं। बर्फीली पहाड़ियों पर चढ़ने पर शरीर में पानी की कमी भी हो जाती है। इसे दूर करने के लिए पहाड़ पर जमी बर्प को काटकर एल्युमीनियम के बर्तन में गरम करते हैं। यही पानी पीते हैं। अभी-अभी खबर आई है कि आठ शेरपा शिखर पर पहुंच चुके हैं। ऐसा करने वाले इस साल के पहले पर्वतारोही हैं। मेरे ग्रुप का 15 मई के आसपास शिखर पर जाने का प्लान है। अब जैसे-जैसे हम ऊंचाई तक पहुंचेंगे ऑक्सीजन कम होती जाएगी। फेफड़ों में पानी भरने व दिमाग शून्य होने का खतरा होता है। इस साल भारत से आठ महिलाएं माउंट एवरेस्ट पर जाने वाली हैं, मुझे लगता है कि सबसे पहले मैं ही शिखर पर पहुंचूंगी। बैस्ट ऑफ लक मेघा परमार।

-अनिल नरेन्द्र