Saturday, 23 September 2017

कितनी सुरक्षित हैं दिल्ली की सड़कें पैदल यात्रियों के लिए

राजधानी दिल्ली की सड़कें पैदल यात्रियों के लिए कितनी सुरक्षात हैं जानलेवा हादसों से साबित होता है। तमाम दावों के बावजूद दिल्ली में पैदल यात्रियों के साथ जानलेवा सड़क हादसों में कमी नहीं आ रही है। वर्ष 2016 में हुई कुल जानलेवा दुर्घटनाओं में से पैदल यात्रियों के साथ हुए हादसों का प्रतिशत 42.9 रहा। वर्ष 2015 में जहां 684 पैदल यात्री मारे गए थे, वहीं 2016 में भी यह आंकड़ा 1683 तक जा पहुंचा। इस वर्ष अगस्त माह तक ही पैदल यात्रियों की मौत का आंकड़ा 500 को पार कर चुका है। ट्रैफिक पुलिस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पैदल यात्रियों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं की मुख्य वजह वाहनों की तेज रफ्तार, सड़कों की गलत बनावट, सड़कों पर रोशनी के उपायों की कमी होना है। इसके अलावा रात में सड़कों पर फुटपाथ पर लोगों का सोना व पुलिस की मौजूदगी कम होने से वाहन चालक ट्रैफिक नियमों की परवाह नहीं करते। ट्रैफिक लाइट्स बंद होने से भी यह समस्या बढ़ जाती है। सड़क पार करने के लिए दिल्ली में पर्याप्त पैदल यात्री संकेतक नहीं हैं। पैदल यात्री सुरक्षित तरीके से रोड पार कर सकें, उसके लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में पेलिकॉन सिग्नल लगाने चाहिए। मगर अभी तक ऐसा नहीं हो पाया। दिल्ली में करीब 50 पेलिकॉन सिग्नल काम कर रहे हैं और इतने ही खराब पड़े हैं। पेलिकॉन सिग्नल से वाहन चालकों का समय बचेगा, साथ ही पैदल यात्री सुरक्षित तरीके से सड़क पार कर सकेंगे। दिल्ली की करीब 70 सड़कें ऐसी हैं, जहां सेंट्रल वर्ज टूटे हैं या फिर ग्रिल गायब हैं। इन्हीं जगहों पर दुपहिये वाहन चालक और पैदल यात्री शॉर्टकट लगाने का प्रयास करते हैं। संकेतक रहित करीब 480 चौराहों पर भी पैदल यात्रियों के लिए बड़ा खतरा है। कई चौराहों पर जेबरा क्रॉसिंग, स्टॉप लाइन व पैदल यात्री थम संकेतक गायब हैं। चौराहों पर पर्याप्त संकेतक न होने के कारण पैदल यात्री हादसे के शिकार होते हैं। यहां बसों में शाम के समय जल्द से जल्द स्टॉप पर पहुंचने की होड़-सी लग जाती है। जल्दी पहुंचने के चक्कर में यह भी नहीं देखते कि अमुक व्यक्ति सड़क पार कर रहा है। उन्हें मालूम है कि अगर वह उस पर बस सढ़ा भी देते हैं तो कोई बड़ा खामियाजा उन्हें नहीं भुगतना पड़ेगा। आए दिन इन बेतहाशा रफ्तार से चलने वाली बसों के पैदल चलने वाले शिकार होते हैं। पैदल यात्रियों के साथ होने वाले सड़क हादसों को रोकने के लिए दिल्ली सरकार और टैफिक पुलिस ने पांच वर्ष पहले सभी सड़कों पर फुटपाथ व ब्रिज, सब-वे, पैदल यात्री संकेतक, यात्रियों के लिए सुविधाजनक फुटपाथ, सड़क के मध्य ग्रिल और एस्कलेटर बनाने की घोषणा की थी मगर पांच वर्षों बाद भी इनमें से एक भी काम पूरा नहीं हुआ है।

-अनिल नरेन्द्र

राहुल गांधी का नया अवतार

देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हैं। वहां वह छात्रों, थिंक टैंक व बुद्धिजीवी वर्ग से रूबरू हो रहे हैं। उनके भाषणों की चर्चा चारों ओर हो रही है। अमेरिका में वह देश की नीतियों पर प्रधानमंत्री मोदी के उठाए गए कदमों पर तीखे सवाल कर रहे हैं। छवि निर्माण के लिहाज से उनका यह दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह अपनी पार्टी की हार के कारणों पर भी खुलकर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि राहुल की साफगोई की चर्चा हो रही है पर सबसे ज्यादा चर्चा है जनता से जुड़े मुद्दों के चयन की। राहुल गांधी की आमतौर पर छवि एक नासमझ व नाकाबिल नेता के रूप में बन गई है। उनका यह अमेरिका का दौरा यह साबित करने का प्रयास है कि वह प्वाइंट टू प्वाइंट बात करके अपना नया अवतार दिखाना चाहते हैं। भारतीय राजनीति में तो वह एक बड़े राजनीतिक घराने के युवा और आकर्षक शख्सियत के तौर पर ही जाने जाते रहे हैं। यहां तक कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा उन्हें नॉन परफॉर्मर नेता के तौर पर ही प्रचारित करती है। लेकिन जिस तरह पिछले कुछ दिनों से राहुल ने विदेश में विभिन्न मसलों पर केंद्र में सत्तासीन भाजपा की सरकार को घेरा है, उससे उनकी छवि गंभीर और परिपक्व नेता की बनी है। राहुल के आक्रामक तेवर और सही मुद्दों को उठाने से उनकी पार्टी कांग्रेस में एक नया उत्साह व उम्मीद बन रही है। अपनी पुरानी बनी छवि तोड़ने की दिशा में यह दौरा राहुल के लिए अच्छी शुरुआत है। यह आलोचना हो रही है कि राहुल को विदेश में भारत की समस्याओं की चर्चा नहीं करना चाहिए पर राहुल एक तरह से मोदी की नकल ही कर रहे हैं। मोदी के विदेश दौरे के बाद उनका कद काफी बढ़ा था। लगता है कि राहुल गांधी भी इसी राह पर चल रहे हैं। राहुल को इस बात का अच्छे से पता है कि भाजपा की नीतियों को लेक देश की जनता में भारी रोष है। अब वह पहली जैसी बात नहीं है। जनता में गुस्सा और मायूसी है। यही वजह है कि राहुल जनता से जुड़ी बातों और परेशानियों को अपने भाषणों में उठा रहे हैं। मसलन भारत में नौकरियों के अवसर पैदा कर पाने में सरकार का नाकाम रहना। इस दौरान उन्होंने भारत समेत पूरी दुनिया में असहिष्णुता बढ़ने पर दुख जाहिर किया। हर दिन रोजगार बाजार में 30,000 नए युवा शामिल हो रहे हैं और इसके बावजूद सरकार प्रतिदिन केवल 500 ही नौकरियां पैदा कर पा रही है। इसमें बड़ी संख्या में पहले से ही बेरोजगार युवा शामिल हैं। प्रिसंटन यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ बातचीत में राहुल ने स्वीकार किया कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को भारत में सत्ता इसलिए मिली क्योंकि लोग कांग्रेस पार्टी से बेरोजगारी के मुद्दे पर नाराज थे। उन्होंने कहा कि रोजगार का पूर्ण मतलब राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में लोगों को सशक्त करना और शामिल करना है। राहुल गांधी जानते हैं कि आज देश की जनता परेशान है, हैरान है। उन्होंने सोच-समझ कर ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिनका सीधा संबंध जनता और देश की उन्नति से जुड़ा है। साथ ही मेक इन इंडिया नीति की विफलता और राजनीतिक प्रणाली का केंद्रीकरण के मसले पर राहुल ने बेबाकी से अपनी राय रखी। बेशक ऐसा करने से राहुल का मंतव्य जनता के मन में भाजपा के खिलाफ फिलवक्त माहौल बनाना है जिसे वे कैश करना चाहते हैं। आज देश की जनता के सामने सबसे बड़ी समस्या भाजपा के विकल्प की है। राहुल कांग्रेस को भाजपा का विकल्प बनाना चाहते हैं। मीडिया में खबरों के अनुसार वह कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद वह महीने संभाल सकते हैं। राहुल को बाखूबी मालूम है कि यूपीए के 10 साल के शासन में किन-किन बातों और नीतियों को लेकर जनता ने भाजपा को पहली पसंद बनाया था। विदेश में राहुल का कार्यक्रम दरअसल कांग्रेस पार्टी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी राहुल को इसी बहाने वैश्विक समझ रखने वाले परिपक्व नेता के तौर पर स्थापित करना चाहती है। राहुल अगर अध्यक्ष बनते हैं तो महत्वपूर्ण यह होगा कि वह अपनी युवा टीम के साथ पुराने अनुभवी कांग्रेसी नेताओं को भी साथ रखें। अगर राहुल मार खा रहे हैं तो एक बहुत बड़ी वजह है उनके इर्द-गिर्द अनुभवी, परिपक्व नेताओं की कमी।

Friday, 22 September 2017

400 साल पहले हुई थी रामलीलाओं की शुरुआत

देशभर में और राजधानी दिल्ली में रामलीलाओं की परंपरा बहुत पुरानी है। काशी की रामलीला की शुरुआत के मूल में देशभक्ति की भावना है। संवत 1600 में संत तुलसीदास ने मुगलों के खिलाफ एकजुटता के लिए रामलीला को माध्यम बनाया तो 19वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों के खिलाफ लामबंदी के लिए छह से अधिक रामलीलाओं का विकास हुआ। इस बार दिल्ली में 500 से ज्यादा छोटी-बड़ी रामलीलाओं का आयोजन हो रहा है। राजधानी के ऐतिहासिक दशहरा पर्व पर राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री सहित विदेशी राजदूत लीला का अवलोकन करने आते हैं। दिल्ली शहर में चार रामलीलाएं ऐसी हैं जो 400 साल से अधिक पुरानी हैं। इनके यहां लीला श्रीराम के वनगमन से होती है। सबसे पुरानी रामलीला श्री चित्रकूट रामलीला समिति की है जिसका इस बार 474वां वर्ष है। इसके अतिरिक्त मौनी बाबा की रामलीला, लाट भैरव और अस्सी की रामलीला का इतिहास 400 वर्षों से अधिक पुराना है। संत तुलसीदास के मित्र मेघा भगत ने संवत 1600 में श्री चित्रकूट रामलीला समिति की स्थापना की थी। लगभग उसी समय संत तुलसीदास ने अस्सी क्षेत्र में रामलीला की शुरुआत की। लीलाएं शुरू करने के पीछे तुलसीदास का उद्देश्य जनमानस में यह भाव भरना था कि जिस प्रकार राम के युग में रावण का अंत हुआ, उसी प्रकार अत्याचारी मुगल शासन का भी अंत होगा। दिल्ली को गंगा-जमुनी तहजीब का संगम भी कहा जाता है, जो यहां बोली, खानपान और पहनावे में भी दिखता है, यह यहीं नहीं रुकता। एक तरफ जहां जाति-पाति और धर्म, मजहब को लेकर लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, वहीं दिल्ली की रामलीलाओं में हिन्दू-मुस्लिम कलाकार भाई-भाई बनकर बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। यह अपने आपमें एक मिसाल है। लालकिले पर होने वाली नव श्री धार्मिक लीला कमेटी में कुंभकरण का किरदार निभाने वाले मुजीबुर्रहमान का कहना है कि कलाकार का कोई धर्म नहीं होता। वह जब जिस व्यक्ति या पात्र का अभिनय करता है तब उसी के अनुसार ढल जाता है। वह एक पेशेवर कलाकार हैं और वर्तमान में गुड़गांव स्थित किंगडम ऑफ ड्रीम थियेटर में काम करते हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ उन्हीं की नहीं बल्कि उनकी मां की इच्छा थी कि वे प्रभु श्रीराम का किरदार निभाएं। इस किरदार को समझने के लिए वह मंदिर भी जाते हैं। लीला के दौरान सारे नियमों का पालन करते हैं। जन-जन के हृदय में राम जितनी सहजता से समाए हैं, उनकी लीला का स्वरूप उतना ही विविध है। राजधानी दिल्ली की संस्कृति जिन पारंपरिक मूल्यों से आज इतनी घनी बनी है उनमें रामलीला आयोजन सबसे अव्वल है। तुलसी कृत राम चरित मानस से निकली हर अनंता आगामी दिनों में मंच पर साकार और चरितार्थ होती दिखाई देगी। मंचन का शुभारंभ हो चुका है। लालकिले की प्रसिद्ध लव कुश रामलीला में मंचन के लिए बॉलीवुड कलाकार का शामिल होना खास है। इस बार यहां स्पेशल उच्च तकनीक का भी इस्तेमाल होगा। बॉलीवुड कलाकारों के अलावा स्पेशल स्टंट, मंच पर ही नदी व झरनें के अलावा लाइव दृश्य दिखाए जाएंगे। नव श्री धार्मिक रामलीला में सेट डिजाइन के साथ इस बार किरदारों की वेशभूषा भी खास होगी। इस बीच दिल्ली पुलिस के आला अफसर भी सुरक्षा प्रबंधों को लेकर पूरी चौकसी बरत रहे हैं। बड़े बजट की ज्यादा भीड़ वाली रामलीलाएं आतंकियों के निशाने पर रहती हैं। उम्मीद की जाती है कि इस वर्ष रामलीलाओं में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़ेगी और जो अपार भीड़ लीला देखने आएगी वह निर्विघ्न इसका आनंद ले सकेगी।

-अनिल नरेन्द्र

योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले छह माह

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में छह महीने का कार्यकाल पूरा करने पर योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि उनकी सरकार ने बीते 15 वर्ष से चल रही परिवारवाद व जातिवाद की राजनीति को खत्म कर युवा व किसान केंद्रित राजनीति की शुरुआत की है। उन्होंने कहा कि इन छह महीने में जहां प्रदेश में उद्योगों में निवेश का फ्रैंडली माहौल बनाया है वहीं जंगलराज के खात्मे के साथ ही कानून का राज स्थापित हुआ है। बीते छह महीने में प्रदेश में एक भी दंगा न होना भी एक रिकार्ड है। उन्होंने कहा कि उनके शपथ लेने से पहले प्रदेश में प्रतिमाह औसतन दो दंगे होते थे। हालात यह थे कि 2012-2017 के बीच जहां दो बड़े दंगे हुए, वहीं हर सप्ताह दो दंगों का रिकार्ड रहा। कई बार तो दंगाइयों को मुख्यमंत्री आवास पर सम्मानित तक किया गया लेकिन उनकी सरकार ने छह माह के भीतर जहां कानून व्यवस्था नियमित की वहीं आम जनता में सुरक्षा की भावना जगी। छह महीने का कार्यकाल पूरा होने पर मुख्यमंत्री ने पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की मौजूदगी में पुलिस की जमकर पीठ ठोंकी। उन्होंने कहा कि छह माह में दुर्दांत अपराधियों के साथ हुई 431 मुठभेड़ों में 17 खतरनाक अपराधी ढेर हुए और 1106 गिरफ्तार हुए, जिनमें से 668 पर इनाम घोषित था। इन मुठभेड़ों में 88 जवान घायल हुए, जबकि एक सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश सिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। वहीं अपने आपराधिक साम्राज्य का विस्तार कर अकूत सम्पत्ति अर्जित करने वाले 69 अपराधी गैंगस्टर एक्ट के तहत अपनी सम्पत्ति जब्त करवा बैठे। वास्तव में दुख से कहना पड़ता है कि तमाम दावों के बावजूद विकास के मद में सिर्फ तीन फीसदी राशि खर्च की गई और राजकीय घाटा 3.5 फीसदी हो गया। यही नहीं, सूबे के सार्वजनिक उपक्रमों का घाटा बढ़कर 91,000 करोड़ रुपए हो गया। किसानों की समस्याएं और रोजगार के मुद्दे पर काफी कुछ कहने के साथ ही कहा गया कि योगी सरकार को विरासत में अराजकता, गुंडागर्दी, अपराध व भ्रष्टाचार मय विषाक्त वातावरण मिला। वास्तव में उत्तर प्रदेश आर्थिक विकास और मानव विकास सूचकांक के मामले में आज भी फिसड्डी है। 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश को बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ बीमारू राज्य की संज्ञा दी गई थी, यही संज्ञा उसके लिए स्थायी रूप से विशेषण बन गई। कुल मिलाकर अब भी विकास के प्रश्नों के उत्तर प्रदेश उत्तर तलाश रहा है। योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च को सत्ता संभालने के साथ मितव्यता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी, जिसका असर भी नजर आने लगा है पर योगी जी को अभी लंबा रास्ता तय करना है। शुरुआत तो अच्छी है, देखें, आगे क्या होता है?

Thursday, 21 September 2017

भारतीय जेलों में अव्यवस्था और अमानवीय हालात

भारतीय जेलों में अव्यवस्था और बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार पर चिंता जताते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर जेलों में सुधार पर ध्यान दिया है और इस सिलसिले में 11 सूत्री दिशा-निर्देश भी जारी किए। इसके साथ ही माननीय अदालत ने जेलों के साथ-साथ बाल गृहों में  अस्वाभाविक मौतों के शिकार कैदियों के परिजनों को उचित मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। यह सवाल इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में पुलिस सुधारों को लेकर जो सात सूत्री दिशा निर्देश जारी किए थे उनकी कुल मिलाकर अनदेखी ही हुई है। अदालत ने कहा कि सभी हाई कोर्ट 2012 से 2015 के बीच जेलें में हुई अस्वाभाविक मौतों का संज्ञान लेते हुए खुद जनहित याचिका दर्ज करें और उसके लिए मुआवजे का भी प्रबंध करें। कैदियों खासकर पहली बार अपराध करने वालों के परामर्श के लिए काउंसलर और सहायक कार्मिक नियुक्त किए जाएं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी अदालत ने निर्देश दिए हैं कि हिरासत या संरक्षण में रखे गए बच्चों की हुई अस्वाभाविक मौतों की सूची तैयार करे और उनके लिए संबंधित राज्य सरकारों से विचार-विमर्श करे। जेल में व्याप्त अमानवीय स्थितियों में सुधार के उपाय किए जाएं। पहले भी अनेक मौकों पर जेल सुधार की मांग उठती रही है मगर इस दिशा में उल्लेखनीय कदम अब तक नहीं उठाए जा सके हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश का कहां तक पालन हो पाएगा, देखने की बात है। सभी जानते हैं कि जेलों में उनकी क्षमता से कहीं अधिक कैदी रखे गए हैं। इसके चलते जेलों में व्यवस्था बनाए रखना आसान काम नहीं है। आए दिन कैदियों में विभिन्न गुटों का खूनी संघर्ष होता रहता है। दिल्ली के सबसे सुरक्षित कहे जाने वाले तिहाड़ जेल में दो दिन पहले ही कैदियों के दो गुटों में जमकर खूनी हिंसा हुई। तैनात पुलिस बल के अलावा अतिरिक्त पुलिस बल को बुलाना पड़ा। हालात काबू करने के लिए जेल अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन गुस्साए उग्र कैदियों ने उन पर हमला बोल दिया। इस दौरान कई कैदी भी घायल हुए। साथ ही जेल के 13 सुरक्षकर्मी घायल हो गए। जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की वजह से कैदियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन तो होता ही है साथ-साथ उनके स्वास्थ्य, भोजन, चिकित्सा आदि पर समुचित ध्यान न दिए जाने या फिर उनके साथ अमानवीय व्यवहार के चलते अकसर कई अस्वाभाविक मौत के शिकार हो जाते हैं। इन मौतों को आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जेलों में कैदियों के बढ़ते बोझ का एक बड़ा कारण मुकदमों का लंबे समय तक लटकना भी है। जेलों में बंद लगभग आधे से अधिक कैदी ऐसे हैं जिन पर बहुत मामूली अपराध के आरोप हैं और सजा से ज्यादा समय वह जेलों में बतौर अंडरट्रायल ही बिता देते हैं। बहुत सारे विचाराधीन कैदी  फैसले के इंतजार में सलाखों के पीछे रहने को मजबूर हैं। कई ऐसे होते हैं जिन्हें मामूली जुर्माना लगाकर बरी किया जा सकता है पर वे विचाराधीन कैदी के रूप में कारावास की सजा भुगतने को मजबूर हैं। भारतीय जेलों की दुर्दशा का हाल यह है कि जब किसी का विदेश से प्रत्यर्पण करने की कोशिश की जाती है तो उनके वकील इस दलील की आड़ अवश्य लेते हैं कि भारतीय जेलों की व्यवस्था तो घोर अमानवीय है। क्या यह किसी से छिपा है कि केरल के मछुआरों की हत्या के आरोपी इटली के नौसैनिकों से लेकर विजय माल्या तक के वकील ऐसी ही दलीलें दे चुके हैं। सुप्रीप कोर्ट का यह कहना बिल्कुल सही है कि जेलों में जरूरत से ज्यादा कैदी तो हैं पर वहां पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। अच्छा होगा कि सुप्रीम कोर्ट यह भी महसूस करे कि न्यायिक सुधारों की ओर बढ़ने और अदालतों को मुकदमों के बोझ से बुरी तरह दबी न्यायिक व्यवस्था में सुधार करने का वक्त आ गया है। अगर मुकदमों का निपटारा शीघ्र हो तो अंडर ट्रायलों की संख्या अपने आप कम हो जाएगी और जब इनकी संख्या कम होगी तो जेलों में कैदियों की संख्या घट जाएगी।

öअनिल नरेन्द्र

रोहिंग्या देश की एकता व अखंडता के लिए खतरा हैं

देश में अवैध तरीके से रह रहे बहुत से रोहिंग्या मुस्लिमों के संबंध पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकी संगठन आईएसआईएस से हैं। यह देश में हवाला और फर्जी दस्तावेजों का कारोबार चला रहे हैं और भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा हैं। यह बात केंद्र सरकार ने रोहिंग्या पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर 16 पेज के हलफनामे में कही है। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि किस शरणार्थी को देश में रखा जाए और किसे नहीं, यह सरकार का पॉलिसी मैटर है। इस अधिकार में कोई दखल नहीं दे सकता। कई आतंकी पृष्ठभूमि में हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सरकार के पास और कई जानकारियां हैं जो बहुत अहम हैं लेकिन फिलहाल उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। अगर अदालत को जरूरत होगी तो सरकार सीलबंद लिफाफे में यह जानकारी दे सकती है। सरकार ने कहा है कि कुछ रोहिंग्या मुसलमान अवैध और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। हवाला के जरिए अवैध रूप से फंड इकट्ठा करते हैं। मानव तस्करी भी कर रहे हैं।  फर्जी पेन कार्ड और आधार कार्ड भी बनवा लिए हैं। उनके यहां रहने से भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार भी प्रभावित होंगे क्योंकि देश के संसाधनों का इस्तेमाल अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलमान भी करेंगे। ताजा संकट इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि रोहिंग्या मुसलमानों के अराकन रोहिंग्या समवेशन आर्मी (एआरएएसए) के लड़ाकों ने 25 अगस्त 2017 को सेना और बार्डर पुलिस की 25 चौकियों पर हमला बोल दिया और एक दर्जन सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी। इस पर सेना ने रोहिंग्या सफाई अभियान शुरू कर दिया है। अब तक करीब चार लाख लोग म्यांमार से भागकर पड़ोसी बांग्लादेश पहुंच चुके हैं। ऊपर से देखने में यह धर्म के आधार पर प्रताड़ित किए जाने का मामला लगता है लेकिन हकीकत यह है कि असली लड़ाई प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे को लेकर है। बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा पर बसे रोहिंग्या दशकों से रोजगार की तलाश में सीमा पार आते-जाते रहे हैं, लेकिन पिछले 50 साल के सैनिक शासन में म्यांमार में उन्हें धीरे-धीरे नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित किया जा चुका है। उन्हें वहां से भागकर उनकी जमीनों को सरकार और जापान, कोरिया व चीन की राष्ट्रीय कंपनियों के हवाले किया जा रहा है, ऐसा कहना रोहिंग्या मुसलमानों का है। रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में भारत की खुफिया एजेंसियें के पास कई सनसनीखेज बातें हैं। सूत्रों के मुताबिक आईएसआई 1971 में बांग्लादेश के गठन के बाद से ही रोहिंग्या मुस्लिमों के सांप्रदायिक इस्तेमाल की कोशिश में लगी है। आईएसआई बांग्लादेश और उत्तर-पश्चिम म्यांमार के रोहिंग्या बहुल रखाइन इलाके के कट्टरपंथियों को मिलाकर एक अलग मुस्लिम क्षेत्र बनाने का ब्ल्यू प्रिंट तैयार कर चुकी है। इस तबके का भारत, बांग्लादेश और म्यांमार के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए आईएसआई बेकरार है। दो दिन पहले रोहिंग्या मुसलमानों को ट्रेनिंग देकर तैयार करने की साजिश के लिए भारत आए अल-कायदा आतंकी को गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बांग्लादेशी मूल के इस ब्रिटिश नागरिक को रविवार शाम को दिल्ली के शकरपुर बस स्टेंड से पकड़ा। पहले उसने अपना नाम ग्रॉमन हक बताया लेकिन असलियत में वह समीगन रहमान उर्फ राजू भाई निकला। रोहिंग्या मुस्लिम मूल रूप से बांग्लादेशी हैं। इन्हें बांग्लादेश ही जाना चाहिए। बांग्लादेश में इनके लिए कई शिविर तैयार किए हैं। खबर है कि तुर्की ने बांग्लादेश को रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए धन देने का वायदा भी किया है। भारत पहले से ही लाखों बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ से परेशान है। भारत  ने सारी दुनिया के शरणार्थियों का ठेका नहीं ले रखा। हमने यूरोप का हाल देखा है। वहां सीरिया और इराक के लाखों मुसलमानों ने शरण ली है। इनमें अलकायदा ने और आईएसआईएस ने अपने हत्यारे घुसेड़ दिए हैं। आए दिन यूरोप के किसी न किसी शहर में बम विस्फोट, सुसाइड ब्लास्ट के केस हो रहे हैं। हम भारत सरकार के स्टैंड से सहमत हैं। देश की एकता व अखंडता की खातिर हम कोई नया जोखिम नहीं ले सकते।

Wednesday, 20 September 2017

बिल्डर खरीददारों से दगाबाजी नहीं कर सकते

यह बहुत खुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट इन डिफाल्टर बिल्डरों के खिलाफ सख्त कदम उठा रहा है। कुछ बिल्डरों ने अति मचा रखी है। जनता ने अपनी गाढ़ी कमाई से घर का सपना पूरा करने के लिए इन्हें विश्वास में पैसा दे दिया और बदले में फ्लैट की जगह दर-दर की ठोकरें खाने पर खाली हाथ मजबूर हैं। यह बिल्डर पैसा भी खा गए और फ्लैट भी अभी तक वर्षों बीतने के बाद भी नहीं दिए। सुप्रीम कोर्ट ने कई बिल्डरों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। शुक्रवार को रीयल एस्टेट फर्म यूनिटेक के प्रवर्तकों संजय चन्द्रा और अजय चन्द्रा को अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपना धन वापस मांगने वाले खरीददारों के आंकड़े उपलब्ध होने के बाद ही उनकी याचिका पर विचार किया जाएगा। जेल में बंद चन्द्रा बंधुओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय में 2015 में दर्ज आपराधिक मामले में उनकी याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत से अंतरिम जमानत का आग्रह किया है। यह मामला गुरुग्राम में स्थित यूनिटेक परियोजनाओंöवाइल्ड फ्लावर कंट्री और अथियां परियोजना के 158 खरीददारों ने दायर किया है। न्यायाधीश पवन सी. अग्रवाल ने कहा कि उन्हें अभी तक कंपनी की 55 परियोजनाओं का पता चला है। नौ परियोजनाओं में करीब 4000 घर खरीददारों के कंपनी को लगभग 1800 करोड़ रुपए का भुगतान किए जाने का अनुमान है। उधर जेपी ग्रुप भी बुरी रह फंस गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फ्लैट देने में देरी करने पर जेपी एसोसिएट्स को आदेश दिया कि वह 10 खरीददारों को 50 लाख रुपए का अंतरिम मुआवजा दे। कोर्ट ने कहा कि बिल्डर खरीददारों से दगाबाजी नहीं कर सकते। न्यायालय ने यह भी कहा कि घर खरीददारों से सामान्य निवेशकों जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने अपने सिर पर छत के लिए अपनी गाढ़ी कमाई खर्च की है। पैसे लेकर समय पर फ्लैट न देने के आरोप में जेपी ग्रुप के चेयरमैन मनोज गौड़ समेत 12 अधिकारियों के खिलाफ केस भी दर्ज किया गया है। दनकौर कोतवाली में दिल्ली के शाहदरा निवासी एक खरीददार और उनके साथियों की ओर से दर्ज की गई शिकायत पर शुक्रवार को यह कार्रवाई की गई। गुप्ता का आरोप है कि जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड तथा जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिकारियों ने उन्हें झांसे में रखकर फ्लैट बुक कराए। खरीददारों का कहना है कि कंपनी ने 33 लाख रुपए फ्लैट बुक करते समय लिए और इतनी ही राशि आवंटन पर देना तय हुआ। पहली किस्त 2015 में और उसके बाद दूसरी किस्त 2017 में  ली गई। इसके बाद भी फ्लैट नहीं मिला तो कंपनी के अधिकारियों से शिकायत की गई। उन्होंने खरीददारों से तीन माह का समय मांगा पर इसके बाद भी कब्जा नहीं दिया गया। आम्रपाली के प्रोजेक्टों में फ्लैट खरीदने वाले सैकड़ों लोग शनिवार सुबह सड़कों पर उतर आए। देखें कि क्या अदालत की कार्रवाई का असर होता है क्या?

-अनिल नरेन्द्र