Sunday, 18 February 2018

दिल्ली को दहलाने वाली यह महिला अपराधी

एक समय था जब चोरी करने में पुरुष आगे होते थे पर समय बदल गया है अब चोरी करने में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। राजधानी दिल्ली में महिला अपराधियों की फौज तैयार हो रही है। पुरुषों के वेश में मोबाइल चोरी करने वाली 32 वर्षीय महिला, हत्या का ठेका लेने वाली आठ बच्चों की मां और सबसे बड़ा वेश्यावृत्ति का रैकेट चलाने वाली 35 वर्षीय महिला दिल्ली की नामी अपराधियों की सूची में शामिल हैं। इनमें से कुछ ऐसी हैं जो गॉड फादर की भूमिका में हैं और पुरुषों के साथ मिलकर गिरोह चलाती हैं। दिल्ली में मोस्ट वांटेड 62 वर्षीय बशीरन आठ बच्चों की मां है, जो बीते एक महीने से फरार है। बशीरन पर उगाही, डकैती और अवैध रूप से शराब बेचने के मामले दर्ज हैं। उसके छह लड़के हैं जिनमें एक नाबालिग है, उन पर 99 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या, डकैती, उगाही, चोरी और अन्य संगीन अपराध शामिल हैं। जेल से बाहर आने के बाद अगले दिन ही बशीरन ने मुन्नी बेगम नाम की एक महिला से 60 हजार रुपए में एक युवक की हत्या की सुपारी ले ली थी। पुलिस को संगम विहार के जंगल में एक जली हुई लाश मिली थी। बशीरन मूलत राजस्थान से ताल्लुक रखती है। 38 साल की सोनू पंजाबन को 24 दिसम्बर 2017 को वेश्यावृत्ति का रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सोनू मूलत रोहतक की रहने वाली है। सोनू पहले भी कई बार गिरफ्तार हो चुकी है। 13 साल की लड़की ने उस पर आरोप लगाया था कि उसे मारा-पीटा गया और वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेलने की कोशिश की गई। 2011 में उसे मकोका के तहत गिरफ्तार किया गया था। सोनू का पहला पति गैंगस्टर था, जो मुठभेड़ में वर्ष 2004 में मारा गया था। उसका दूसरा पति भी 2006 में एनकाउंटर में मारा गया। उस पर पांच हत्या, मानव तस्करी और पॉस्को एक्ट में मामले दर्ज हैं। रामप्रीत कौर उर्फ रानी 32 साल की है। बीते साल पुलिस को इस बात की जानकारी मिली थी कि वह पुरुषों के कपड़े पहनकर बाइक से मोबाइल छीनती है। बीते एक साल में इसी पर डकैती और झपटमारी के नौ मामले दर्ज हैं। 42 वर्षीय सायरा बेगम का 28 साल पुराना आपराधिक रिकार्ड है। महिला व उसके पति अफाक को 2016 में दिल्ली में सबसे बड़ा वेश्यावृत्ति का रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सायरा के जेल में रहने पर उसके साथी कोठे को चलाते हैं। आरोप है कि उसका पति नेपाल से लड़कियां लाता है। 53 साल की शकीला का पूर्वी दिल्ली के शकरपुर थाने में बतौर बेड करेक्टर नाम दर्ज है। महिला ने बतौर सब्जी विक्रेता का काम शुरू किया और बाद में जुए का बड़ा रैकेट चलाने लगी। उस पर 21 मामले दर्ज हैं।

-अनिल नरेन्द्र

इस घोटाले ने तो बैंकिंग व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं

बैंकों को चूना लगाकर विदेश भागे विजय माल्या जैसे ही एक और बड़े मामले में गुरुवार को एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) ने कई जगह छापेमारी की। मुख्य आरोपी अरबपति हीरा कारोबारी नीरव मोदी के मुंबई, सूरत और दिल्ली समेत 17 ठिकानों पर छापे मारकर 5700 करोड़ रुपए की सम्पत्ति जब्त की गई। नीरव मोदी पर पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई में सिर्फ एक ब्रांच से 11,400 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का आरोप है। इसे देश के बैंकिंग सेक्टर का सबसे बड़ा फ्रॉड कहा जा रहा है। पीएनबी में सामने आए इस 11,400 करोड़ रुपए के देश के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले से पूरी बैंकिंग व्यवस्था की चूलें हिल गई हैं, जोकि पहले से ही फंसे कर्ज और बदइंतजामी से जूझ रही है। पीएनबी का प्रबंधन भले ही सफाई दे कि यह गड़बड़ी 2011 से चल रही थी और उसने अपने कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई भी की थी, लेकिन इस घोटाले से जुड़े ढेरों सवालों का जवाब मिलना बाकी है। करीब 11,400 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे पीएनबी की कीमत शेयर बाजार के हिसाब से करीब 30,000 करोड़ रुपए की है। यानी कुल कीमत के करीब एक-तिहाई मूल्य के दायित्व इस घोटाले की वजह से पैदा हुए इस बैंक के लिए। इस बैंक को हाल में जितनी नई पूंजी सरकार से मिली थी, उस पूंजी की करीब दोगुनी रकम इस घोटाले में उड़ने की आशंका है। मोटे तौर पर इस घोटाले को यूं समझा जा सकता है कि पीएनबी से करीब 11,400 करोड़ के भुगतान की ऐसी गारंटी ग्लोबल संस्थाओं को दी गई, जिसके बारे में बैंक का कहना है कि वह गारंटी अनधिकृत थी। यानी बैंक में शीर्ष प्रबंधन को नहीं पता पर किसी जूनियर अफसर ने पीएनबी की तरफ से ऐसी गारंटी दे दी। घोटाले से जुड़े सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं लेकिन यदि घोटाले के बारे में पहले ही किसी तरह की भनक मिल गई थी तो जौहरी नीरव मोदी और उनके साथी किस तरह से फर्जी गारंटी के जरिये दो दर्जन बैंकों की विदेशी शाखाओं से लिए कर्ज दबाए बैठे रहे? यह भी गले नहीं उतरता कि पीएनबी के सिर्फ दो अधिकारियों ने स्विफ्ट मैसेजिंग सिस्टम के जरिये संदेश भेजकर नीरव मोदी और उनके साथियों की आभूषण कंपनियों के लिए विदेशों में कर्ज का इंतजाम कर दिया। हैरानी की बात यह है कि बैंक आम ग्राहकों को छोटा-मोटा कर्ज देने के लिए भी दर्जनों चक्कर लगवाते हैं, कई तरह की औपचारिकताएं और गारंटी वगैरह मांगते हैं। लेकिन एक जौहरी को हजारों करोड़ रुपए कर्ज देने के लिए फर्जी गारंटी दे दी जाए और बैंक प्रबंधन, प्रवर्तन निदेशालय, वित्त मंत्रालय और अन्य वित्तीय संस्थाओं को इसकी भनक तक न लगे यह कैसे संभव हो गया? विजय माल्या का मामला तो अभी पुराना भी नहीं पड़ा है, इसके बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने न तो अपने निगरानी तंत्र को और न ही जवाबदेही को मजबूत किया। हर किसी के मन में पहला सवाल यही आता है कि जब दो-चार लाख का भी कर्ज देने में सरकारी बैंक फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं तो करीब 11,400 करोड़ रुपए का घोटाला कैसे हो गया? नीरव मोदी की गिनती भारत के 50 सबसे धनी व्यक्तियों में होती है। फोर्ब्स पत्रिका ने 2016 में उन्हें अरबपतियों की सूची में भारत में 46वें और दुनिया में 1067वें स्थान पर बताया था। पर अब यह साफ हो गया है कि उनकी इस उपलब्धि और शौहरत के पीछे धोखाधड़ी और लूट का बहुत बड़ा हाथ रहा होगा। क्या इस तरह का तरीका अपनाने वाले नीरव मोदी अपवाद हैं? यह घोटाला ऐसे वक्त सामने आया है जब एक ही दिन पहले रिजर्व बैंक ने एनपीए की बाबत और सख्ती दिखाते हुए सरकारी बैंकों को निर्देश जारी किया कि वे फंसे हुए कर्ज के मामले एक मार्च से छह महीने के भीतर सुलझा लें। बिना अदायगी वाले पांच करोड़ रुपए से ज्यादा के खातों का ब्यौरा हर सप्ताह देना होगा। सच तो यह है कि अगर पंजाब नेशनल बैंक तय नियमों के अनुसार काम कर रहा होता और उनका निगरानी तंत्र सजग होता तो नीरव मोदी बैंक को खोखला करने का काम कर ही नहीं सकता था। क्या यह अजीब नहीं कि नीरव मोदी के गोरखधंधे की शुरुआत 2011 में हुई, लेकिन उसे करीब सात साल के बाद ही पकड़ा जा सका? आखिर पंजाब नेशनल बैंक ने समय रहते इसकी परवाह क्यों नहीं की कि नीरव सैकड़ों-करोड़ों की रकम उधार लिए जा रहा है और उसे चुकाने का नाम नहीं ले रहा है? यह एक पैटर्न बन गया है कि बड़ा घोटाला करो और विजय माल्या की तरह देश से बाहर निकल जाओ। गौरतलब है कि पीएनबी सरकारी बैंक है। इसमें राजनीतिक निहितार्थ है। इसलिए घोटाले की खबर आते ही यह स्पष्टीकरण आ गया कि यह घोटाला 2011 से यानी मौजूदा सरकार के 2014 में आने से पहले चल रहा है। राजनीतिक बहस अपनी जगह पर मुद्दा यह है कि इतने बड़े बैंक को सरकार डूबने नहीं देगी। इसमें और पूंजी डाली जाएगी। यह पूंजी जाहिर है कि आप, हम करदाताओं की जेब से ही जाने वाली है। नीरव मोदी और उनके साथियों पर कार्रवाई करने के साथ ही पीएनबी के लाखों छोटे खाताधारियों के हित सुरक्षित रहें, यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है वरना बैंकिंग व्यवस्था से ही उनका विश्वास उठ जाएगा।

Saturday, 17 February 2018

ईरानी राष्ट्रपति रूहानी के दौरे का महत्व

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी गुरुवार को तीन दिवसीय भारत यात्रा पर हैदराबाद पहुंचे। बेगमपेट एयरपोर्ट पर रूहानी का भव्य स्वागत हुआ। रूहानी की हैदराबाद की यह दूसरी यात्रा है। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद वह पहली बार यहां आए हैं। ईरान के राष्ट्रपति के इस दौरे में चाबहार बंदरगाह, भारत और ईरान के बीच तेल व्यापार सहित कई दूसरे आर्थिक मुद्दों पर बात होने की उम्मीद है। ईरान भारत को तेल सप्लाई करने वाला तीसरा बड़ा देश है। इसके अलावा अगर हम राजनीतिक परिदृश्य से देखें तो भारत और ईरान की अफगानिस्तान में सहयोगी भूमिका रही है। लेकिन अब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ रुख अपनाया है तो ऐसे में भारत को फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना होगा ताकि दोनों देशों से भारत का बैलेंस बना रहे। साथ ही भारत का रुख फिलस्तीन और इजरायल को लेकर ईरान से अलग रहा है। वहीं सऊदी अरब में भारत अमेरिका के कदम के साथ दिखता है। ऐसे में अगर विदेश कूटनीति को देखें तो दोनों देशों के बीच बहुत से सवाल मौजूद हैं। इसलिए फिलहाल तो इस दौरे से ऐसा नहीं लगता कि कोई बड़ा रणनीतिक कदम उठाए जाने की संभावना है। मनमोहन Eिसह के कार्यकाल के दौरान एक समय भारत और ईरान के रिश्ते काफी नाजुक मोड़ पर आ गए थे। उस समय ईरान को भारत की बहुत जरूरत थी। लेकिन अब मध्य पूर्व के जो समीकरण हैं उनमें ईरान भारत पर बहुत अधिक निर्भर नहीं है। इसलिए यह देखना होगा कि भारत को तेल के अलावा ईरान की कितनी अधिक जरूरत है। फिलहाल तो पिछले एक साल से भारत की विदेश नीति अमेरिका केंद्रित हो गई है। ऐसे में ईरान की भूमिका अभी तक साफ नहीं है। 1970 से 1980 के दशक में भारत और ईरान के बीच अच्छी ठोस विदेश नीति थी। ईरान ऐसा देश रहा जो कश्मीर पर कभी ज्यादा नहीं बोलता था। यहां तक कि जब इस्लामिक राष्ट्र कश्मीर के लिए कोई प्रस्ताव पारित करते थे तब भी ईरान का रुख भारत समर्थित ही रहता था। उसके बाद मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भारत-अमेरिका के बीच करीबी रिश्ते बनने से ईरान और भारत की दूरी बढ़ने लगी। भारत और ईरान दोस्ती का सबसे बड़ा सबूत है चाबहार। ऐसे में देखें तो भारत को लेकर ईरान की विदेश नीति में बहुत फर्क आया है। भारत का ईरान से तेल की सप्लाई का रिश्ता है। क्योंकि वह भारत को सस्ता तेल मुहैया करवाता है। वहीं ईरान को भारत के रूप में एक लोकतांत्रिक देश के समर्थन की जरूरत है। स्वागत है राष्ट्रपति रूहानी का।
-अनिल नरेन्द्र


इन जांबाज जवानों पर हमें गर्व है



जम्मू के सुंजवां आर्मी कैंप पर हमले के दौरान आतंकियों से मुकाबला करते हुए देश के बहादुर जवानों के एक से बढ़कर एक रोमांचक किस्से सामने आ रहे हैं। हमले में मेजर अभिजीत इस कदर घायल हो गए थे कि उन्हें तीन-चार दिन तक बाहरी दुनिया की कोई खबर ही नहीं रही। सर्जरी के बाद होश में आते ही भारत के इस बहादुर लाल का पहला सवाल थाöआतंकियों का क्या हुआ? मेजर अभिजीत का इलाज ऊधमपुर के आर्मी अस्पताल में चल रहा है। ऊधमपुर कमांड अस्पताल के कमांडेंट मेजर जनरल नदीप नैथानी ने कहा कि अभिजीत का आत्मबल काफी ऊंचा है। घायल मेजर वापस ड्यूटी पर जाने के लिए भी तत्पर है। सुंजवां हमले में शहीद हुए पांच सैनिकों में एक ऐसा जांबाज भी था जिसने बिना हथियार ही कायर आतंकियों से लौहा लिया और शहीद होने से पहले अपने परिवार सहित न जाने कितने लोगों की जान बचाई। एके-47 राइफलें, ग्रेनेड और अन्य घातक हथियारों से पूरी तरह लैस होकर आए आतंकियों से वह अकेले और निहत्थे ही भिड़ गए। सीना व शरीर के अन्य हिस्से आतंकियों की गोलियों से छलनी हो गए। देशभक्ति में डूबा खून का एक-एक कतरा बह गया, लेकिन आतंकियों को अंतिम सांस तक रोके रखा। अपने परिवार के साथ अन्य कई सैन्य परिवारों की जान बचाकर वह जांबाज शहीद हो गया। यह शौर्य गाथा शनिवार को फिदायीन हमले में शहीद हुए जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के सूबेदार मदन लाल (50) की है। शहीद का परिवार मिलिट्री स्टेशन सुंजवां स्थित उनके क्वार्टर में आया था। मदन लाल के भतीजे की शादी के लिए वे शॉपिंग करने को ठहरे हुए थे तभी फिदायीन हमला हुआ। आवासीय क्षेत्र में घुसे आतंकी सूबेदार मदन लाल के क्वार्टर की ओर बढ़े। तब मदन लाल के पास कोई हथियार नहीं था। आतंकियों ने उन पर एके-47 से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। शहीद होने से पहले उनका भरसक प्रयास यही रहा कि उनका पूरा परिवार पीछे के गेट से बाहर निकल जाए। हालांकि इसमें उनकी 20 वर्षीय बेटी नेहा को टांग में गोली लग गई। साली परमजीत कौर को भी मामूली चोटें आईं लेकिन वे वहां से बच पाने में सफल हो गईं। शहीद मदन लाल अगर कुछ देर आतंकियों को रोके रखने में सफल नहीं होते तो कुछ और लोगों की जान भी चली जाती। मदन लाल के भाई सुरिन्दर कहते हैं कि मुझे अपने छोटे भाई पर गर्व है जो अपने परिवार को बचाने के लिए आखिरी दम तक आतंकियों से लौहा लेता रहा। हम बहादुर शहीदों को श्रद्धांजलि पेश करते हैं। जय हिन्द।

Friday, 16 February 2018

आम आदमी पार्टी का तीन साल का कार्यकाल

आम आदमी पार्टी (आप) की दिल्ली सरकार को तीन साल पूरे हो गए हैं। इन तीन सालों में दिल्ली सरकार के साथ-साथ आम आदमी पार्टी को भी कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा है। सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने तगड़ी सियासी मोर्चाबंदी की है। सरकार के कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने खुद ही मोर्चा संभाल रखा है। 2015 में आप ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता हासिल की थी। एक ओर जहां आम आदमी पार्टी एक के बाद एक ट्वीट कर अपनी उपलब्धियां गिना रही है, वहीं भाजपा और कांग्रेस भी ट्वीट से सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। आम आदमी पार्टी ने ट्वीट कर अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि हमने बिजली कंपनियों की सीएजी जांच कराई, जिससे कंपनियों में हड़कंप मच गया। साथ ही कहा कि हमने बिल में 50 फीसदी की कटौती की, बिजली की घंटों कटौती को बंद किया और बिजली कंपनियों पर जुर्माना लगाया और तीन साल में बिजली के दामों में कोई वृद्धि नहीं हुई। 750 लीटर तक पानी को मुफ्त कर घोषणा पत्र का वादा पूरा किया। शिक्षा में  बदलाव किए, निजी स्कूलों पर शिकंजा कसा। हैल्थ स्कीम लागू की, आम आदमी हैल्थ कार्ड भी बनेगा। डोर स्टेप योजना को मंजूरी मिली, 40 योजनाओं में लाभ। जानकारों का कहना है कि शुरुआती दो साल में दिल्ली सरकार की और आप की छवि को इतना नुकसान नहीं पहुंचा जितना तीसरे साल में हुआ। खासतौर पर पंजाब और गोवा चुनाव के बाद। पंजाब से पहले आम आदमी पार्टी दिल्ली को लेकर बेफिक्र थी। यही बेफिक्री कहीं न कहीं एमसीडी चुनाव में भी भारी पड़ती दिखी। चुनाव आते-आते पार्टी के अंदर आंतरिक कलह काफी बढ़ गई और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इसका आभास हो गया, जिसके बाद केजरीवाल ने खुद दिल्ली के मैदान में मोर्चा संभाला लेकिन मनमुताबिक परिणाम हासिल नहीं कर पाए। एमसीडी चुनाव में हुई हार के बाद से पार्टी के अंदर जो उठापटक शुरू हुई थी, वह अभी तक भी शांत नहीं हो सकी। पार्टी दो खेमों में बंटती दिखी और कुमार विश्वास व कुछ अन्य नेताओं के बीच जो मतभेद थे, वे उभरकर बाहर आ गए। इन तीन सालों में केजरीवाल सरकार कई विवादों में फंसी। तीन वर्ष से लगातार सरकार और दिल्ली के एलजी के बीच टकराव रहा है। शिक्षकों की भर्ती का मामला हो या स्वास्थ्य सेवाओं का। सरकार बनने के साथ ही मंत्रियों को लेकर विवाद शुरू हो गए। स्टिंग ऑपरेशन से लेकर फर्जी डिग्री के आरोप मंत्रियों पर लगे। इस मामले में आम आदमी पार्टी के चार मंत्रियों को अपना पद छोड़ना पड़ा। सरकार में संसदीय सचिव बनाने के मामले पर जमकर विवाद हुआ। चुनाव आयोग ने 20 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया। राष्ट्रपति ने भी इस मामले में मंजूरी दे दी। अब मामला दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहा है। कई मामलों में सरकार और अफसरों के बीच विवाद सतह पर आ गया। इसे लेकर मुख्यमंत्री कई बार अपनी आपत्ति जता चुके हैं। ताजा मामला सीएम के संदेश पर अफसरों ने अपनी सहमति नहीं दी। आप सरकार बार-बार सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही है। बीते वर्ष सत्येन्द्र जैन को लेकर सीबीआई जांच हुई। पहले उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ और जांच हुई। बीते दिनों सीबीआई की एक रेड में सत्येन्द्र जैन से संबंधित दस्तावेज मिलने का दावा किया गया, हालांकि सरकार इससे इंकार करती रही। उम्मीद है कि आम आदमी पार्टी को इतना तो समझ में आ गया होगा कि उसकी छवि को नुकसान हुआ है। यह अंदाजा था कि पार्टी के स्तर में थोड़ी गिरावट आएगी, जो एंटी इनकंबैंसी के कारण स्वाभाविक मानी जा रही थी। लेकिन कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा, सत्येन्द्र जैन प्रकरण जिस तरह से चर्चा में रहे उससे पार्टी की लोकप्रियता को कुछ ज्यादा नुकसान हुआ है। पार्टी को भी यह अंदाजा हो चुका है कि अपनी साख बचाने के लिए उसे दिल्ली पर ही पूरा जोर लगाना होगा। यही कारण है कि पार्टी ने अभी से आने वाले चुनावों की तैयारी शुरू करते हुए जनसम्पर्क और संगठन को मजबूत करने का काम शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी सरकार की मुखालफत में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का मैदान में उतरना भी कम दिलचस्प नहीं है। लंबे समय के बाद शीला दीक्षित प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन के साथ मीडिया के सामने आईं। उनके साथ उनकी सरकार में मंत्री रहे तमाम नेताओं के अलावा दिल्ली कांग्रेस के तमाम कद्दावर नेता मौजूद थे। समझा जा रहा है कि एकजुट होकर आम आदमी पार्टी से निपटने की रणनीति के तहत कांग्रेस के कई नेता एक मंच पर इकट्ठा हो रहे हैं। उधर भाजपा के नेता विजेन्द्र गुप्ता का कहना है कि तीन वर्षों में 67 सीटों का रिकार्ड बहुमत सिमट कर 42 सीटों पर रह गया है। स्कूल, अस्पताल व सड़क सेवाओं में सुधार नहीं हुआ। सरकार के चार मंत्रियों को विभिन्न आरोपों की वजह से उनके पदों से हटाना पड़ा है। पांचवें मंत्री सत्येन्द्र जैन जेल जाने की तैयारी में हैं। दिल्ली सरकार महिलाओं को सुरक्षा मुहैया करवाने में पूरी तरह नाकाम रही है।
-अनिल नरेन्द्र


Thursday, 15 February 2018

आईएसआई का हनीट्रेप

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को देश से जुड़ी खुफिया सूचना देने के आरोप में भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन की गिरफ्तारी चौंकाने वाली है। वैसे तो भारत-पाकिस्तान दोनों एक-दूसरे की जासूसी करते रहते हैं पर जब अपने ही देश का कोई व्यक्ति दुश्मन के लिए जासूसी करते पकड़ा जाए, तब और भी दिक्कत भरा होता है जब पकड़ा जाने वाला व्यक्ति सेना का ही कोई अधिकारी हो। भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन अरुण मारवाह की गिरफ्तारी इसी लिहाज से परेशान करने वाली खबर है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि वायुसेना के मुख्यालय में तैनात इस अफसर को पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई ने जिस तरह अपने जाल में फंसाया उससे कान खड़े हो जाते हैं। सैनिकों को प्रलोभन देने के लिए विष-कन्याओं के इस्तेमाल की कहानियां हम सुनते आए हैं, लेकिन इस बार कोई विष-कन्या नहीं, बल्कि महिलाओं के नाम पर बनी फेक आईडी थी। अदालत के समक्ष पुलिस ने बताया कि कुछ महीने पहले वायुसेना के ग्रुप कैप्टन अरुण मारवाह त्रिवेंद्रम गए थे। वहीं आईएसआई के खुफिया एजेंट ने लड़की बनकर फेसबुक पर उनसे दोस्ती की थी। इसके बाद दोनों में लगातार फोन पर चैटिंग होने लगी। दोनों ने एक-दूसरे को अश्लील मैसेज दिए। लड़की बने आईएसआई एजेंट ने सेक्स चैट के जरिये मारवाह को जाल में फंसा लिया। करीब 10 दिन चली चैट के दौरान एजेंट ने कैप्टन को अंतरंग बातों में पूरी तरह फंसाकर उससे कई गोपनीय दस्तावेज की मांग की। मारवाह ने कुछ गोपनीय दस्तावेजों को मुहैया करा दिया। कुछ सप्ताह बाद एयरफोर्स के एक वरिष्ठ अधिकारी को मारवाह की इस हरकत के बारे में जानकारी मिली। अधिकारी ने उस पर आंतरिक जांच बैठा दी। जांच के दौरान अरुण मारवाह की जासूसी में संलिप्तता पाए जाने के बाद एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारी ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक से इसकी शिकायत की और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बृहस्पतिवार को उसे गिरफ्तार कर लिया। मारवाह ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उसका एक पुराना साथी भी इसमें शामिल था। उसने स्वीकार किया कि उसका साथी कथित दो पाकिस्तानी महिलाओं का साझा दोस्त था, जिन्हें इन्होंने कई गोपनीय सूचनाएं लीक की थीं। मारवाह ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने महिलाओं को फेसबुक पर वायुसेना के अभियान के बारे में जानकारी दी। मुख्यालय में तैनाती के कारण कई अहम और गोपनीय दस्तावेजों तक उनकी पहुंच थी।
-अनिल नरेन्द्र


मोहन भागवत के बयान को लेकर सियासी बवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की सेना पर की गई टिप्पणी से सियासी बवाल मच गया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुजफ्फरपुर में कहा थाöहमारा मिलिट्री संगठन नहीं है, मिलिट्री जैसा अनुशासन हमारा है। अगर देश को जरूरत पड़े और देश का संविधान-कानून कहे तो सेना तैयार करने को छह-सात महीने लग जाएंगे, संघ के स्वयंसेवकों को कर लेंगे तीन दिन में तैयार। यह हमारी क्षमता है लेकिन हम मिलिट्री संगठन भी नहीं हैं, हम तो पारिवारिक संगठन हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भागवत के बयान को सेना और तिरंगे का अपमान करार देते हुए इसे शर्मनाक कहा। वहीं कांग्रेस ने भागवत की ओर से देश और सेना से माफी की मांग करते हुए कहा कि प्रजातंत्र में प्राइवेट मिलिशिया की इजाजत नहीं दी जा सकती। वहीं कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री मोदी से स्थिति साफ करने को कहा है। कहा कि भागवत का बयान चौंकाने वाला है। ऐसे बयान से हमारी सेना के मनोबल को कमजोर करता है। भारत की सेना दुनिया की बड़ी सेनाओं में है, जिसने आजादी के बाद ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी है। इसमें पाक सेना का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश की आजादी शामिल है। सेना ने हमारी सीमाओं को सुरक्षित रखा है और ऐसे समय में जब हम बड़ी चुनौती और सैनिक ठिकानों पर हमलों का सामना कर रहे हैं तो भागवत ने हमारी सेना की क्षमता और शौर्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। भागवत के बयान पर विवाद होता देख संघ की तरफ से सफाई दी गई है। कहा गया है कि भागवत ने सेना और स्वयंसेवकों के बीच तुलना नहीं की बल्कि यह स्वयंसेवक और आम लोगों के बीच तुलना थी। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने कहाöसर संघचालक के बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। वैद्य ने कहाöयह सेना के साथ तुलना नहीं थी पर सामान्य समाज और स्वयंसेवकों के बीच में थी। उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भागवत का इशारों-इशारों में बचाव किया है। उन्होंने कहाöअगर कोई संगठन यह कहता है कि वह देश की सुरक्षा करने को उत्सुक है तो क्या यह विवाद का विषय है? केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने ट्वीट कियाöसेना हमारा गौरव है। आपातकाल में हर भारतीय को सुरक्षाबलों के साथ खड़े होने के लिए स्वयं आगे आना चाहिए। भागवत ने सिर्फ यह कहा कि एक व्यक्ति को सैनिक के तौर पर तैयार होने में छह-सात महीने लगते हैं। अगर संविधान इजाजत दे तो संघ के काडर में सहयोग देने की क्षमता है। संघ प्रमुख के बयान पर यह पहला विवाद नहीं है। वह पहले भी ऐसे विवादास्पद बयान देते रहे हैं। ऐसे समय जब जम्मू-कश्मीर में युद्ध की स्थिति बनी हुई है तो मोहन भागवत को ऐसे बयानों से बचना चाहिए।