Sunday, 22 April 2018

चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग का नोटिस

कई दिनों से चल रही सुगबुगाहट के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला किया है। सात दलों के नेताओं के दस्तखत वाली अर्जी राज्यसभा के सभापति को सौंप दी गई है। यह पहली बार है जब देश के सबसे बड़े जज के खिलाफ महाभियोग चलाने का प्रस्ताव लाया गया है। राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को 71 सदस्यों के दस्तखत वाले महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद इन दलों ने कहा कि संविधान और न्यायपालिका की रक्षा के लिए हमें भारी मन से यह कदम उठाना पड़ा है। कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने 12 जनवरी की चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस का जिक्र करते हुए कहा कि हम चाहते हैं कि ज्यूडिशियरी का मामला अंदर ही सुलझ जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने दावा किया कि इस कदम का जस्टिस लोया मामले और अयोध्या केस की सुनवाई से कोई संबंध नहीं है। महाभियोग क्या है? महाभियोग वो प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। इसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124(4)(5), 217 और 218 में मिलता है। महाभियोग प्रस्ताव सिर्प तब लाया जा सकता है जब संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हो गए हों। नियमों के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। लेकिन लोकसभा में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के दस्तखत और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी होते हैं। इसके बाद अगर उस सदन के स्पीकर या अध्यक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें। वे इसे खारिज भी कर सकते हैं। तो तीन सदस्यों की एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है। उस समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक ऐसे प्रख्यात व्यक्ति को शामिल किया जाता है जिसे स्पीकर या अध्यक्ष उस मामले के लिए सही मानें। अगर यह प्रस्ताव दोनों सदनों में लाया गया है तो दोनों सदनों के अध्यक्ष मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं। दोनों सदनों में प्रस्ताव देने की सूरत के बाद में तारीख में दिया गया प्रस्ताव रद्द माना जाता है। जांच पूरी हो जाने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या अध्यक्ष को सौंप देती है और उसे अपने सदन में पेश करते हैं। अगर जांच में पदाधिकारी दोषी साबित हों तो सदन में वोटिंग कराई जाती है। प्रस्ताव पारित होने के लिए उसे सदन के कुल सांसदों का बहुमत या वोट देने वाले सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई का समर्थन मिलना जरूरी है। अगर दोनों सदनों में यह प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है। किसी जज को हटाने का अधिकार सिर्प राष्ट्रपति के पास है। आज तक किसी जज को नहीं हटाया गया। भारत में आज तक किसी जज को महाभियोग लाकर हटाया नहीं गया क्योंकि इससे पहले के सारे मामलों में कार्यवाही कभी पूरी नहीं हो सकी। या तो प्रस्ताव को बहुमत नहीं मिला, या फिर जजों ने उससे पहले ही इस्तीफा दे दिया। हालांकि इस पर विवाद है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग का सामना करने वाला पहला जज माना जाता है। उनके खिलाफ मई 1993 में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था। यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया क्योंकि उस वक्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया और प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। कोलकाता हाई कोर्ट के जज सोमैत्र सेन देश के दूसरे ऐसे जज थे जिन्हें 2011 में अनुचित व्यवहार के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा। यह भारत का अकेला ऐसा महाभियोग का मामला है जो राज्यसभा में पास होकर लोकसभा तक पहुंचा। हालांकि लोकसभा में इस पर वोटिंग होने से पहले ही जस्टिस सेन ने इस्तीफा दे दिया। उसी साल सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ भी महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन सुनवाई के कुछ दिन पहले ही दिनाकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस जेपी पार्दीवाला के खिलाफ जाति से जुड़ी अनुचित टिप्पणी करने के आरोप में महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन उन्होंने उससे पहले ही अपनी टिप्पणी वापस ले ली। 2015 में ही मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेल के खिलाफ भी महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन जांच के दौरान उन पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। आंध्रप्रदेश/तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ 2016 और 2017 में दो बार महाभियोग लाने की कोशिश की गई लेकिन इन प्रस्तावों को कभी जरूरी समर्थन नहीं मिला। महाभियोग के नोटिस पर कांग्रेस के भीतर ही गंभीर मतभेद उठते दिखे। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि मैं इस फैसले में शामिल नहीं हूं। वहीं कांग्रेस के पूर्व प्रभारी हरिकेश बहादुर ने कहा कि सिर्प मतभेद ही महाभियोग शुरू करने का आधार नहीं हो सकता। हमें लगता है कि कांग्रेस और विपक्ष भी जानते हैं कि जस्टिस मिश्रा के खिलाफ महाभियोग सफल नहीं हो सकता पर अगर इस प्रस्ताव पर बहस हो गई तो उन्हें अपनी सारी बातें कहने का मौका मिल जाएगा और उसके  बाद भी अगर प्रस्ताव गिर जाता है तो कोई बात नहीं विपक्ष जो चाहता था वह तो हो ही गया होगा। पर अभी तो सिर्प नोटिस दिया है, यह स्वीकार होता है या नहीं इस पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 21 April 2018

आईपीएल का केज

आजकल आईपीएल अपने पूरे जलवे में है। विश्व की सबसे महंगी क्रिकेट लीग इंडियन प्रीमियर लीग टीवी का सबसे बड़ा शो बनती जा रही है। यह न केवल टीवी के दूसरे चैनलों के लिए ही चुनौती बन रही है बल्कि सिनेमाघरों में फिल्मों का भी इसने भट्ठा बिठा दिया है। सिनेमा हॉल आईपीएल से बुरी तरह प्रभावित हैं और कई सिनेमाओं में तो 50 प्रतिशत दर्शकों में ड्रॉप आ गया है। स्टार इंडिया के मुताबिक पिछले वर्ष 55 करोड़ लोगों ने आईपीएल मैच देखे थे जबकि इस बार चैनल और ऑनलाइन प्रसारण से यह आंकड़ा 70 करोड़ पार कर जाएगा। आईपीएल के इस सीजन के पहले मैच में शहरी युवाओं की व्यूरशिप 63.55 लाख इंंप्रैशंस (एक मिनट या इससे अधिक देखने वाले दर्शक) रही, जो पिछले वर्ष से 37 प्रतिशत अधिक है। टीवी दर्शकों का विश्लेषण करने वाली ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल (बार्प) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 में आईपीएल सीजन-10 के दौरान हिन्दी मनोरंजन चैनल्स की दर्शक संख्या में 14 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई वहीं मूवी चैनल्स की दर्शक संख्या में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई क्योंकि सोनी मैक्स की व्यूरशिप हटा दें तो मूवी चैनल्स की दर्शक संख्या में गिरावट दर्ज की गई। इंडियन टेलीविजन डॉट कॉम के सीईओ और विश्लेषक अनिल वनवारी ने बताया कि आईपीएल के सीजन में टीवी चैनल्स पर विज्ञापन की दरें अवश्य बदलती हैं, खासतौर पर आईपीएल मैच दिखाने वाले चैनल पर। सूत्रों के मुताबिक आईपीएल के पिछले मैचों के प्रसारणकर्ता सोनी पिक्चर्स नेटवर्प के मुकाबले इस वर्ष स्टार इंडिया ने विज्ञापन दरें 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ा दी हैं। वनवारी कहते हैं कि यह रकम दो हजार करोड़ रुपए से अधिक हो सकती है। आईपीएल-10 सीजन में सोनी पिक्चर्स नेटवर्प ने प्रसारण से 1200 करोड़ रुपए कमाए थे। आईपीएल-10 की तुलना में सीजन-11 में विज्ञापन दरें 50 प्रतिशत से अधिक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्टार विज्ञापनदाता को हिन्दी, अंग्रेजी के साथ ही बंगाली, तमिल, तेलुगू और कन्नड़ भाषाओं में 10 चैनल की सुविधा भी दे रहा है। स्टार इंडिया से जुड़े अधिकारी ने बताया कि स्टार आईपीएल शुरू होने से पहले ही करीब 90 प्रतिशत से अधिक ऑन एयर इंवेंट्री बेच चुका था और 70 स्पांसरशिप कर चुका है जिसमें 100 से अधिक ब्रैंड के विज्ञापन आए। गौरतलब है कि स्टार इंडिया ने आईपीएल मैचों के पांच साल के टीवी और डिजिटल मीडिया के ग्लोबल मीडिया अधिकार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से 16,357.5 करोड़ रुपए में खरीदे हैं। जबकि चीनी मोबाइल निर्माता कंपनी वीवो इलैक्ट्रॉनिक्स कॉर्प ने 2,199 करोड़ रुपए में पांच वर्ष के  लिए टाइटल स्पांसर करने का अधिकार खरीदा है।
-अनिल नरेन्द्र

स्वाति मालीवाल की जान अब खतरे में है

महामहिम रामनाथ कोविंद ने बुधवार को कठुआ बलात्कार और हत्या मामले को घृणित और शर्मनाक करार देते हुए इसकी निन्दा की। राष्ट्रपति ने कहा कि हमें इस बात पर आत्मचिन्तन करने की जरूरत है कि हम कैसा समाज विकसित कर रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा मानवता के लिए बहुत चिंतित करने वाली बात है और बच्चों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए दृढ़ निश्चय की जरूरत है। उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लंदन में कहा कि दुष्कर्म तो दुष्कर्म है और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। हाल की वारदातों पर उन्होंने कहा कि दुष्कर्म देश के लिए शर्म की बात है। भारत में बच्चियों से दुष्कर्म के मामले में बुधवार को दिन में लंदन की सड़कों पर प्रदर्शनों के बाद शाम को वेस्टमिस्टर के सेंट्रल हॉल में भारत की बात सबके साथ कार्यक्रम में मोदी ने कहा कि नन्हीं बच्ची से दुष्कर्म होना बहुत ही तकलीफदेह है। जब सभी मान रहे हैं कि बच्चियों के साथ दुष्कर्म होना काबिले बर्दाश्त नहीं और इस मुद्दे पर हमें राजनीति नहीं करनी चाहिए तो अनशन पर बैठी दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मालीवाल भी तो यही ही कह रही हैं। अनशन पर बैठी स्वाति की सातवें दिन हालत खराब हो रही है। स्वाति पिछले सात दिनों से सिर्प पानी के सहारे अनशन पर बैठी हैं। बीते सात दिनों में स्वाति से मिलने दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री व अन्य मंत्री के अलावा विभिन्न दलों के सांसद भी राजघाट पहुंचे हैं, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से कोई अभी तक नहीं पहुंचा। स्वाति बेशक सत्तारूढ़ दल से अलग विचारधारा वाली पार्टी की हों पर जो बात या मांग वह कर रही हैं उस पर तो किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। खुद प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि इस मुद्दे पर हमें राजनीति नहीं करनी चाहिए। स्वाति अनशन पर इसलिए बैठी हैं कि महिलाओं के साथ हो रहे रेप के मामलों में सख्त से सख्त कानून बने। उनकी सेहत में लगातार गिरावट आ रही है। लंबे वक्त तक अनशन ले सकता है जान। डाक्टरों का कहना है कि अगर जल्द स्वाति का अनशन नहीं टूटता तो कुछ भी हो सकता है। स्वाति ने भी जिद्द पकड़ रखी है। वह कहती हैं कि प्रधानमंत्री जिद्दी हैं तो मैं उनसे ज्यादा जिद्दी हूं। जब तक वह मेरी मांग नहीं मानेंगे तब तक मैं अपना अनशन नहीं तोड़ूंगी। हम स्वाति जी से कहना चाहते हैं कि वह इसे प्रतिष्ठा का सवाल न बनाएं। शायद ही पूरे देश में कोई ऐसा व्यक्ति हो जो आपकी मांगों का समर्थन न करता हो। पर आप यह हठ छोड़ दें कि पीएम ही आपकी बात पर रिएक्ट करें। हम तो समझते हैं कि अगर दिल्ली के उपराज्यपाल या कोई केंद्रीय मंत्री उन्हें आश्वासन दे कि उनकी मांगों पर गौर किया जाएगा तो यह अनशन समाप्त हो सकता है। स्वाति मालीवाल का अनशन खतरनाक स्टेज पर पहुंच रहा है और अगर जल्द इसका हल नहीं किया गया तो बुरा अंत हो सकता है।

Friday, 20 April 2018

नवाज शरीफ का राजनीतिक कैरियर समाप्त?

हमें यह मानना पड़ेगा कि हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की न्यायपालिका व कानूनी व्यवस्था व जांच एजेंसियां भारत से बेहतर हैं। आप पनामा पेपर्स का ही किस्सा ले लें। हमारे देश में तो अभी जांच ही चल रही है वह भी आधी-अधूरी। पाकिस्तान में न केवल जांच पूरी हो गई है पर वहां की अदालतों ने राजनीतिज्ञों को सजा भी देनी शुरू कर दी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ को 28 जुलाई 2017 को पनामा पेपर्स मामले में दोषी ठहराया गया था। फिर पाक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अयोग्य ठहराया। नवाज शरीफ को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। अब अपदस्थ नवाज शरीफ के आजीवन चुनाव लड़ने पर शुक्रवार को रोक लग गई जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने दूरगामी व ऐतिहासिक फैसलों में कहा कि संविधान के तहत किसी जनप्रतिनिधि की अयोग्यता स्थायी है। इसके साथ ही तीन बार देश के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का राजनीतिक कैरियर हमेशा के लिए खत्म हो गया। पांच न्यायाधीशों की पीठ ने संविधान के तहत किसी जनप्रतिनिधि की अयोग्यता की अवधि का निर्धारण करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया। अदालत संविधान के अनुच्छेद 62(1) एफ पर विचार कर रही थी जिसमें सिर्प इतना कहा गया है कि किसी जनप्रतिनिधि को विशेष परिस्थितियों में अयोग्य ठहराया जा सकता है, लेकिन अयोग्यता की अवधि नहीं बताई गई है। अनुच्छेद 62 में किसी संसद सदस्य के लिए सांदिक और अमीने (ईमानदारी और न्यायपारायण) होने की पूर्व शर्त रखी गई है। गौरतलब है कि इसी अनुच्छेद के तहत 68 वर्षीय नवाज शरीफ को 28 जुलाई 2017 को पनामा पेपर्स मामले में अयोग्य ठहराया गया था। शरीफ को एक और झटका देते हुए अदालत ने यह भी कहा है कि अयोग्य ठहराया गया कोई भी व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का प्रमुख नहीं बन सकता है। इसके बाद उन्हें सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के अध्यक्ष की कुर्सी भी गंवानी पड़ी थी। शुक्रवार को सभी पांचों जजों ने एकमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि जो लोग देश के संविधान के प्रति ईमानदार और सच्चे नहीं हैं, उन्हें जीवनभर के लिए संसद से प्रतिबंधित रखना चाहिए। सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज ने इस फैसले को अस्वीकार करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आतंकवाद का सफाया और विकास परियोजनाओं को शुरू करने की सजा मिली है। यह फैसला एक मजाक है और पिछले प्रधानमंत्रियों के साथ भी हो चुका है। प्रधानमंत्री शाहिद खान अब्बासी ने कहा कि केवल जनता का फैसला उनके लिए मायने रखता है। जियो टीवी के मुताबिक अब्बासी ने मुजफ्फराबाद में कहा कि देश काम करने वाले को हमेशा याद रखता है। जिसके अंत में जनता द्वारा फैसला किया जाएगा।
-अनिल नरेन्द्र


एटीएम खाली ः फिर एक बार नोटबंदी जैसे हालात

नोटबंदी के करीब सवा साल बाद एक बार फिर नोटबंदी की याद ताजा हो गई जब एक बार फिर एटीएम में नो कैश के बोर्ड टंगे नजर आए। देश की राजधानी समेत 10 राज्यों में एटीएम से नकदी नहीं मिलने की खबरें आ रही हैं। इनमें दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं। बाकी राज्यों में भी दिक्कत सामने आने लगी है। नवम्बर 2016 की तकलीफों को लोग बड़ी मुश्किल से भूलने लगे थे। तब एटीएम व बैंकों पर जो लंबी लाइनें लगी थीं और आम लोगों को जो तकलीफें हुई थीं, वह सब फिर से याद आने लगी हैं। बेशक एटीएम का संकट अभी भी गंभीर नहीं हुआ है लेकिन माना जा रहा है कि कैश के संकट से अफवाहों की भी बढ़ोत्तरी स्वाभाविक है। देश के कई हिस्सों में एटीएम पूरी तरह से खाली पड़े हुए हैं, जिनमें कुछ पैसा है भी तो उनके बाहर लंबी लाइनें हैं। 2016 के अंत में जो हुआ था, उसे आसानी से समझा जा सकता था। तब सरकार ने बाजार से ज्यादातर नकदी सोख ली थी जिससे नकदी का संकट पैदा हुआ जो कुछ हफ्तों तक चला और जैसे ही नए नोट छपकर बाजार में आए, वह संकट खत्म हो गया। अब जो हो रहा है वह लोगों को समझ नहीं आ रहा है। कारण की थाह नहीं मिल पा रही है। सरकार और रिजर्व बैंक की तरफ से जो सफाई दी जा रही है वह शायद ही आसानी से किसी के गले उतरे। नवम्बर 2016 में जो हुआ, वह तो एक नीतिगत निर्णय का नतीजा था। लेकिन अप्रैल 2018 में जो हो रहा है वह लोगों के लिए एक पहेली बनी हुई है। सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से जो सफाई दी गई उसका मूल्य महत्व तभी है जब इस संकट को जल्दी से सुलझा लिया जाए। अगर रिजर्व बैंक और सरकार अपने वादे पर खरी नहीं उतरी तो यह संकट और गहरा सकता है और देश के उन हिस्सों को भी अपनी चपेट में ले सकता है जहां यह अभी उतना गंभीर नहीं जितना बिहार, मध्यप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, दिल्ली और देश के कुछ अन्य हिस्सों में दिख रहा है। आरबीआई सफाई दे रहा है कि उसके पास पर्याप्त नकदी नहीं है। लॉजिस्टिक कारणों से कुछ राज्यों में एटीएम में नकदी भरने और कैलिब्रेशन की प्रक्रिया जारी रहने से दिक्कत है। फिर भी सभी चार प्रेसों में नोटों की छपाई तेज कर दी गई है। संदेह है कि दो हजार के नोटों की जमाखोरी हो रही है। निपटने के लिए 500 के नोटों की छपाई पांच गुना बढ़ाई जाएगी। वित्त मंत्रालय का कहना है कि तीन महीने के दौरान नकदी की मांग अप्रत्याशित बढ़ी है। अरुण जेटली का यह भी कहना है कि इस समय अर्थव्यवस्था में उपयुक्त से भी ज्यादा नकदी का प्रसार है। बैंकों के पास भी इसकी कमी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में अचानक और साधारण तरीके से मांग में हुई वृद्धि के कारण तंगी की स्थिति बनी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि देश फिर से नोटबंदी के आतंक की गिरफ्त में है। मोदी जी ने देश की बैंकिंग प्रणाली को बर्बाद कर दिया। उन्होंने हर भारतीय की जेब से 500 और हजार रुपए के नोट छीन लिए और वे नीरव मोदी को दे दिए। लेकिन इसके बारे में न तो एक शब्द बोल रहे हैं और न ही संसद आ रहे हैं। हमारा मानना है कि यह भी संभव है कि मौजूदा संकट किसी बैंकिंग कुप्रबंधन का नतीजा हो। अगर ऐसा है तो यह और भी खतरनाक बात है। हमें यह सच भी स्वीकारना होगा कि हम कैशलैस अर्थव्यवस्था की बातें चाहे कितनी भी करें लेकिन कटु सत्य तो यह है कि आज भी छोटे दुकानदारों, मजदूरों, किसानों के लिए और खासकर अनौपचारिक क्षेत्र के लिए नकदी ही सब कुछ है। अगर जल्द इसका हल नहीं निकाला गया तो यह इस चुनावी माहौल में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ जा सकता है।

Thursday, 19 April 2018

दाऊद इब्राहिम ने वसीम रिजवी की हत्या की सुपारी दी

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उत्तर पदेश के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी को मारने की साजिश का पर्दाफाश किया है। शुकवार को स्पेशल सेल ने रिजवी की हत्या की सजिश में जुटे डी कंपनी के तीन शूटरों को गिरफ्तार किया है। तीनों आरोपियों को पुलिस ने यूपी के बुलंदशहर इलाके से गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक पाकिस्तान में बैठे अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम ने छोटा शकील के जरिए वसीम रिजवी को मारने के लिए इन बदमाशों को जिम्मेदारी दी थी। यह खुलासा दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के डीसीपी पमोद कुशवाहा ने किया। गत मार्च को तीनों ने रिजवी के लखनऊ स्थित कार्यालय की रेकी की थी। कुशवाहा ने बताया कि पुलिस को जानकारी मिल रही थी कि भगोड़ा दाऊद इब्राहिम भारत में बड़ी वारदात करवाने की जुगत में है। इसके बाद पुलिस ने उसके गुर्गों पर नजर रखनी शुरू की। इसी दौरान फोन पर हो रही बातचीत के आधार पर पता चला कि बुलंदशहर के कुछ बदमाश वसीम रिजवी की हत्या की साजिश रच रहे हैं। इस पर पुलिस ने 12 अपैल को बुलंदशहर इलाके में सलीम अहमद अंसारी, अबरार और आरिफ को गिरफ्तार कर लिया। इनका एक और साथी फिलहाल फरार है, गत वर्ष दिसंबर में सलीम दुबई गया था, जहां उसकी मुलाकात दाऊद के दाहिने हाथ छोटा शकील के सहयोगी से हुई थी। उसने वसीम रिजवी को मारने के लिए तीन हजार दिरहम (53 हजार रुपए) पैशगी के तौर पर दिए थे। यह रकम हवाला के जरिए सलीम को मिली थी। शकील के सहयोगी ने सलीम से कहा था कि पहला विकेट गिराओ तुम्हें मालामाल कर देंगे। इसके बाद भारत लौटकर उसने इस साजिश को अंजाम देने का काम शुरू कर दिया। सलीम अहमद ने वसीम रिजवी के लखनऊ स्थित कार्यालय की 10-12 बार रेकी की थी। उसने कार्यालय का पूरा नक्शा बना रखा था। वह अपने साथियों के साथ शिकायतकर्ता बनकर रिजवी के पास जाता और मौका मिलते ही उन्हें गोली मार देता। वारदात के बाद वह अपने दोनों साथियों के साथ दाऊद के एक रिश्तेदार के यहां जाता जहां उन्हें सुपारी की बकाया रकम मिलनी थी। दरअसल वसीम रिजवी दाऊद इब्राहिम और उनके गुर्गों की आंख में किरकिरी तभी से बने हुए थे जब कुछ दिन पहले वसीम रिजवी ने राम मंदिर बनाने को लेकर चल रहे विवाद में बयान दिया था। उनका यह बयान राम मंदिर के पक्ष में था जिसके चलते डान दाऊद इब्राहिम उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। स्पेशल सेल के डीसीपी ने बताया कि हमारी टीम को मार्च में सूचना मिली थी कि कुछ बदमाश अंडरवर्ल्ड के इशारे पर रिजवी की हत्या करने की साजिश रच रहे हैं। इस घटना से पता चलता है कि बेशक दाऊद पाकिस्तान में बैठा हो पर वह भारत में क्या हो रहा है इस पर पैनी नजर रखे हुए है। यह पयास तो विफल कर दिया स्पेशल सेल ने पर खतरा बरकरार रहेगा।

-अनिल नरेन्द्र

मक्का मस्जिद धमाके का जिम्मेदार कौन है?

हैदराबाद स्थित मक्का मस्जिद में 18 मई, 2007 को हुए भीषण विस्फोट के मामले में ग्यारह साल बाद एनआईए ने सोमवार को स्वामी असीमानंद समेत पांच आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जो कि न्यायिक पकिया में देरी का एक उदाहरण है ही साथ में चौंकाने वाली बात यह भी है कि फैसले के कुछ घंटे में ही एनआईए विशेष आतंकरोधी अदालत के जज रवीन्द्र रेड्डी ने इस्तीफा दे दिया। जज रेड्डी ने हालांकि बताया कि उन्होंने निजी कारणें से इस्तीफा दिया है और इसका फैसले से कोई लेना-देना नहीं है। वह कुछ समय से इस्तीफा देने पर विचार कर रहे थे। जज रवीन्द्र रेड्डी इस्तीफा देने के बाद छुट्टी पर चले गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक वह दो माह में रिटायर होने वाले थे। नियुक्ति के मामले में राजभवन के सामने धरना देने के लिए उन्हें दो साल पहले सस्पैंड भी किया गया था वहीं एक केस में नियमों के उलट जमानत देने को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप में सीबीआई उनके खिलाफ जांच भी कर रही है। स्वामी असीमानंद समेत पांचों आरोपियों को बरी किए जाने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस मस्जिद में विस्फोट किसने किया? चूंकि अदालत ने यह पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा इसलिए ऐसे सवाल भी उठेंगे कि क्या एनआईए ने अपना काम सही ढंग से नहीं किया? ऐसे सवालों के बीच इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 11 वर्ष पुराने इस मामले की जांच के पारंभ में स्थानीय पुलिस ने हरकतुल जिहाद नामक आतंकी संगठन को विस्फोट के लिए जिम्मेदार माना और कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया, लेकिन इसके बाद जब मामला सीबीआई के पास आया तो उसने हिंदू संगठनों के कुछ सदस्यों को अपनी गिरफ्त में लिया। इसी के साथ तत्कालीन यूपीए सरकार की ओर से भगवा और हिंदू आतंकवाद का जुमला उछाल दिया गया। इस फैसले से स्वामी असीमानंद और उनके साथियों को राहत तो मिली ही है, भाजपा और संघ परिवार को कांग्रेस और यूपीए पर हमला करने का मौका भी मिल गया है, जिसके कार्यकाल में मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह और समझौता एक्सपेस में हुए आतंकी हमलों के बाद संघ से जुड़े संगठनों पर आरोप लगाए गए थे। भूलना नहीं चाहिए कि यूपीए सरकार के समय इन मामलों के आरोपी बनाए गए संघ परिवार से जुड़े रहे असीमानंद, कर्नल पुरोहित, साध्वी पज्ञा जैसे अनेक लोगों को एक-एक कर राहत मिलती जा रही है। क्या सीबीआई और एनआईए यूपीए सरकार के दबाव में काम कर रही थी? क्या एनआईए ने राजनीतिक दबाव में असीमानंद और अन्य लोगों के खिलाफ मामला बनाया था? वह इन लोगों के खिलाफ सुबूत क्यों नहीं जुटा पाई? असीमानंद और अन्य लोगों को 11 वर्षों तक यातनाएं और अपमान झेलना पड़ा, उसकी भरपाई कैसे होगी और भरपाई करेगा कौन? दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि एनआईए की जांच पक्षपाती है। गुलाम नबी आजाद ने कहा कि सभी जांच एजेंसी केन्द्र सरकार की कठपुतली बन गई हैं। सलमान खुर्शीद ने कहा कि दर्जनों गवाह मुकर गए हैं। इस पर सवाल तो खड़े होते ही हैं? भाजपा पवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि पी. चिदंबरम और सुशील शिंदे जैसे नेताओं ने भगवा आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल कर हिंदुओं का अपमान किया है। इसके लिए सोनिया और राहुल गांधी माफी मांगें। पर मूल सवाल अब भी वही है कि मक्का मस्जिद में बम धमाके का जिम्मेदार आखिर है कौन? इस धमाके में 9 लोगों की मौत हो गई थी और 58 घायल हुए थे। यह मामला तब तक शांत नहीं होगा जब तक कसूरवारों की पहचान नहीं होती और उन्हें अपने किए की सजा नहीं मिलती।