Tuesday, 23 January 2018

हैं तो छोटे राज्य पर चुनाव से बड़े संदेश निकलेंगे

आमतौर पर कम चर्चित रहने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों के चुनाव इस बार ज्यादा चर्चित हो सकते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक के चुनाव की पूर्व पीठिका के तौर पर फरवरी में होने जा रहे त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनाव भाजपा शासित राज्यों की गिनती बढ़ा भी सकते हैं या कांग्रेस का उत्साहवर्द्धन भी कर सकते हैं। वैसे तो ये सारे राज्य छोटे हैं फिर भी इस समय इनका राजनीतिक दृष्टि से व्यापक महत्व है। केरल के बाद माकपा के नेतृत्व में त्रिपुरा में दूसरी सरकार है। पिछले पांच बार से वहां माकपा नेतृत्व वाले वामदल ही चुनाव जीतते आ रहे हैं। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव देश के तीनों राजनीतिक ध्रुवोंöभाजपा, कांग्रेस और माकपा के लिए बेहद अहम है। पूर्वोत्तर में तेजी से बढ़ रही भाजपा इन तीनों राज्यों में भी बढ़ने की तैयारी में है। वह तीनों राज्यों में स्थानीय दलों के साथ गठबंधन करने की जुगत में है। वहीं कांग्रेस व माकपा के सामने अपनी सरकारें बचाने की चुनौती है। मिशन 2019 के मद्देनजर इन तीन राज्यों में लोकसभा की सीटें तो महज पांच ही हैं, लेकिन इन राज्यों के नतीजों का राजनीतिक महत्व ज्यादा है। केंद्र में आने के बाद भाजपा ने पूर्वोत्तर में तेजी से पांव पसारे हैं। सिक्किम समेत आठ राज्यों में से असम, अरुणाचल और मणिपुर में उसकी सरकारें हैं। भाजपा के मंसूबे काफी ऊंचे हैं। उसके एक प्रमुख नेता ने कहा है कि वह लोकसभा चुनाव से पहले पूर्वोत्तर में राजग की सभी आठों राज्यों में सत्ता के साथ जाने की कोशिश करेंगे। त्रिपुरा में देश में पहली बार किसी राज्य में सत्तारूढ़ वामपंथी माकपा व दक्षिणपंथी भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। चूंकि त्रिपुरा माकपा का गढ़ रहा है और वह 1978 के बाद से 40 साल में केवल पांच साल 1988 से 1993 के बीच सत्ता से बाहर रही है। साल 2013 के चुनाव में माकपा को 60 में से 49 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार समीकरण बदले हुए हैं। भाजपा की कोशिश इस वामपंथी गढ़ को ढहाने की है। नागालैंड में भाजपा की सहयोगी एनपीएफ सत्ता में है और दोनों दल फिर से मिलकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। अगर वामदल गढ़ बचाने में कामयाब रहे तो वे मोदी सरकार के खिलाफ गोलबंदी के लिए ज्यादा सक्रिय होंगे। कांग्रेस के सामने मुख्य चुनौती तो किसी तरह मेघालय की सरकार बचाने की है। कोई पार्टी जीते या हारे, देश तो यही चाहेगा कि चुनाव संसदीय लोकतंत्र के संस्कारों के अनुरूप मर्यादाओं से बंधे हुए हों, नेताओं के बयान सीमाओं से बाहर न जाएं और राजनीतिक कटुता न हो।
-अनिल नरेन्द्र


सीमा पर जंग जैसे माहौल से दहशत

लगातार हो रही पाकिस्तानी सैनिकों की गोलाबारी से सीमा पर जंग जैसा माहौल बन गया है। शनिवार को तो लाइन ऑफ कंट्रोल और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर से लगे स्कूल भी बंद रहे। सीमावर्ती इलाकों के गांवों में रहने वालों के बीच दहशत है। युद्ध जैसी स्थिति पर पाक गोलाबारी का भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब दे रही है। शनिवार को लगातार चौथे दिन भी पाकिस्तान की ओर से भारतीय सुरक्षा चौकियों व आवासीय बस्तियों समेत कठुआ के पहाड़पुर से लेकर समूची भारत-पाक सीमा के अलावा नियंत्रण रेखा से सटे राजौरी और पुंछ को निशाना बनाया गया। जम्मू-कश्मीर से लगती पाक सीमा पर हालात किस कदर खराब हो रहे हैं, यह तो इससे स्पष्ट है कि बीते चार दिनों में पांच जवान समेत 11 लोग पाकिस्तानी गोलाबारी का निशाना बने हैं और इससे भी कि सीमांत क्षेत्रों के करीब 40 हजार लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों या फिर अन्य सुरक्षित जगहों पर रहना पड़ रहा है। सीमावर्ती गांवों में घरों में फैला खून, खिड़कियों के टूटे शीशे और ध्वस्त छतों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले चार दिनों में पाकिस्तानी गोलीबारी ने इन इलाकों में कितना नुकसान पहुंचाया है। इन गांवों में गन पाउडर की गंध बनी हुई है। एक स्थानीय निवासी रत्ना देवी ने कहाöहम लोग मौत के साये में जी रहे हैं। हमारे घरों पर मोर्टार बमों की बौछार हो रही है। एक बार तो ऐसा लगा कि अब हम मर जाएंगे, लेकिन पुलिस हम लोगों को बाहर निकाल लाई। देवी ने बताया कि साईं खुर्द में गोलाबारी में कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए हैं। कई जानवरों की मौत हो गई है। संघर्षविराम उल्लंघन के चलते सीमावर्ती बस्तियों से 10,000 से अधिक लोगों को पलायन करना पड़ा है। चूंकि पाकिस्तानी सेना लगातार गोलाबारी कर रही है इसलिए हालात युद्ध जैसे नजर आ रहे हैं। युद्ध जैसे यह हालात उस छद्म युद्ध का हिस्सा हैं जो पाकिस्तान ने कश्मीर पर थोपा हुआ है। पाकिस्तानी सेना ने बीते एक हफ्ते में करीब 100 गांवों को निशाना बनाया है। आमतौर पर जम्मू-कश्मीर में वर्ष में एकाध बार वैसी स्थिति बन ही जाती है जैसी आज नजर आ रही है। इसका एक कारण यह भी है कि न तो सीमा को अभेद्य बनाया जा सका है और न ही किसी ऐसी योजना पर जिसके तहत जम्मू-कश्मीर के सीमांत इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाया जा सका। जिस प्रकार से पाकिस्तान गोलाबारी कर रहा है उससे साफ है कि अब घुसपैठियों के साथ-साथ पाक सेना भी खुलकर सामने आ गई है। यह जो गोलाबारी हो रही है यह न तो कोई जेहादी संगठन कर सकता है और जिस प्रकार मोर्टार बमों का इस्तेमाल हो रहा है यह सिर्फ पाक सेना ही कर सकती है। आरएसपुरा के एसडीपीओ सुरिन्दर चौधरी का कहना है कि सीमावर्ती इलाके वास्तव में युद्ध क्षेत्र में बदल गए हैं। पाकिस्तानी नागरिक इलाकों को निशाना बना रहे हैं। इससे मकानों और जानवरों को काफी नुकसान हुआ है। हम सीमावर्ती इलाकों के गांवों के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि हम स्थिति को काबू में लाने के लिए क्या कर रहे हैं? आए दिन पाकिस्तान के हुक्मरान परमाणु बम मारने की धमकी देते हैं। उन्होंने हमारे पांच मारे और हमने उनके 10 मारे यह समस्या का समाधान नहीं है। अंध विरोध से ग्रस्त पाकिस्तान भारत को न केवल सबसे बड़ा खतरा मानता है, बल्कि उसे नुकसान पहुंचाकर उसकी बराबरी भी करना चाहता है। ऐसी पागलपन भरी सोच से ग्रस्त देश से सामान्य तौर-तरीकों से नहीं निपटा जा सकता। दुखद पहलू यह भी है कि हमारे कुछ कश्मीरी नेता कह रहे हैं कि उनसे बात की जानी चाहिए। इन परिस्थितियों में बात कैसे हो? मोदी सरकार को इस ज्वलंत समस्या का कोई स्थायी हल निकालना होगा।

Sunday, 21 January 2018

सकारात्मक संकेतों से सेंसेक्स में भारी उछाल

आर्थिक मोर्चे पर सकारात्मक संकेतों के चलते सेंसेक्स बुधवार को रिकार्ड 35000 अंक के आंकड़े के पार निकल गया। शेयर बाजार हालांकि पिछले कुछ दिनों से उड़ान भर रहा था, लेकिन मौजूदा वित्तवर्ष में अतिरिक्त उधारी का लक्ष्य 50,000 करोड़ से घटाकर 20,000 करोड़ करने की सरकार की घोषणा ने जैसे उसमें नई जान फूंक दी। विशेषज्ञों के मुताबिक इसके कई कारण हो सकते हैं। अतिरिक्त उधारी का 50 से घटकर 20 हजार करोड़ रुपए होने के कारण भी बाजार में तेजी आई। फिर जीएसटी-नोटबंदी से उभरते हुए औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने से भी बाजार में यह उछाल आया है। वहीं टीसीएस, इंफोसिस आदि के बेहतर नतीजों के कारण भी बाजार रिकार्ड स्तर पर पहुंचा है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ते आर्थिक सुधारों से विदेशी के साथ घरेलू निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। ऐसे में कोई संदेह नहीं है कि 2018 के अंत तक 40 हजार के आंकड़े को छू सकता है। जबकि निफ्टी 12800 के अंक तक पहुंच सकता है। अप्रैल-मई तक सेंसेक्स 37 हजार और निफ्टी 11300 अंक तक जा सकता है। नोटबंदी और जीएसटी की व्यावहारिक परेशानियों का उद्योग व्यापार पर जो असर पड़ा था अब वह धीरे-धीरे कम हो रहा है। साथ ही सरकार जीएसटी को जरूरत अनुसार घटा रही है उससे भी बाजार में उत्साह है। औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोत्तरी और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बढ़ती बिक्री जैसे आंकड़ों से भी अर्थव्यवस्था के प्रति उम्मीद बढ़ी है। हालांकि शेयर बाजार पूरी अर्थव्यवस्था का आईना तो नहीं होता, भारत जैसे देशों में तो और नहीं, जहां सिर्फ 20 फीसदी आबादी की ही शेयर बाजार में मौजूदगी है। कृषि और रोजगार के मोर्चे पर स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है और ऊपर जाती मुद्रास्फीति व कच्चे तेल में आ रही तेजी भी चिन्ता बढ़ाती है। लेकिन आर्थिक अनुशासन के मोर्चे पर सरकार के खरे उतरने और पिछले झटकों से उभरते हुए अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के संकेत की उम्मीद तो जगाते ही हैं। आर्थिक सुधारों के प्रति सरकार की दृढ़ता ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। इसके अलावा भाजपा को राज्यों में मिली सफलता और केंद्र में स्थिरता ने भी बाजार में भरोसा पैदा किया है। उछाल में आईटी सेक्टर की बेहतर परफार्मेंस भी एक कारण रहा है। 13 मई 2014 को सेंसेक्स 24069 था जो 2018 में बढ़कर 35081 हो गया।

-अनिल नरेन्द्र

सीलिंग से बाजारों में आतंक

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देश पर हो रही दिल्ली में सीलिंग से दिल्ली वालों को जल्द राहत मिलने की उम्मीद नहीं नजर आ रही है। सीलिंग के खिलाफ कारोबारियों में नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है। मॉनिटEिरग कमेटी के सदस्यों ने साफ कर दिया है कि अभी तक सीलिंग सिर्फ कन्वर्जन चार्ज को लेकर हो रही थी, आने वाले दिनों में अवैध निर्माण को लेकर भी सीलिंग का अभियान चलाया जाएगा। राजधानी दिल्ली में अब अफरातफरी का दौर आने वाला है। पिछले कुछ दिनों से राजधानी में सीलिंग की कार्रवाई चल रही है। बाजारों में हाहाकार मचा हुआ है। असल में केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी ने अपने एक्शन को रोक दिया था। लेकिन अब वह इस आदेश से मुक्त हो गई है, इसलिए उसने एक्शन की ठान ली है। अफसरों को आदेश दिए गए हैं कि अवैध निर्माण पर एक्शन लें, साथ ही कन्वर्जन चार्ज न देने वालों की दुकान को भी सील करना शुरू कर दें। सीलिंग का मामला दिल्ली में भाजपा नेताओं के गले से नहीं उतर रहा है। नए-नए पार्षदों को जनता का सामना करना भारी पड़ रहा है। ऐसे में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी के खिलाफ दिल्ली भाजपा नेताओं का रोष बढ़ रहा है। चर्चा है कि चूंकि हरदीप पुरी एक ब्यूरोक्रेट हैं, इसलिए अभी तक दिल्ली की जनता को सीलिंग से निजात नहीं मिल पा रही है। इनका मानना है कि पुरी के स्थान पर कोई पॉलिटिकल व्यक्ति होता तो अब तक जरूर सीलिंग से दिल्ली को राहत मिल चुकी होती। उत्तरी दिल्ली नगर निगम में कांग्रेस दल के नेता मुकेश गोयल ने कहा कि दुकानदारों एवं व्यापारियों को सीलिंग से राहत दिलाने के लिए भाजपा व आम आदमी पार्टी गंभीर नहीं है। इन पार्टियों के नेता इस मुद्दे पर न केवल नूराकुश्ती कर रहे हैं बल्कि गलतबयानी कर लोगों को गुमराह करने में लगे हैं। कांग्रेस सीलिंग से दिल्लीवासियों को स्थायी राहत दिलाने के पक्ष में है, इसी कारण कांग्रेस निगम की आम सभा में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा कर ठोस निर्णय या नीति बनाना चाहती थी लेकिन बैठक शुरू होते ही आम आदमी पार्टी के पार्षदों ने इस मुद्दे पर शोर-शराबा करना शुरू कर दिया। उधर आप के प्रवक्ता दिलीप पांडे ने आरोप लगाया है कि भाजपा शासित निगम ने कन्वर्जन शुल्क के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया है। निगम ने व्यापारियों को लूटने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सालों से भाजपा शासित एमसीडी ने व्यापारियों से कन्वर्जन चार्ज समेत रजिस्ट्रेशन फीस और पार्किंग चार्ज के नाम पर हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम इकट्ठा की थी, लेकिन वो रकम कहां गई यह भाजपा के नेता बता नहीं पा रहे हैं। भाजपा ने दिल्ली एमसीडी को अपने भ्रष्टाचार का अड्डा बना रखा है। प्रदेश भाजपा ने दिलीप पांडे के आरोपों को नकारते हुए कहा है कि वसूला गया कन्वर्जन चार्ज एवं पार्किंग शुल्क बाजारों में सुविधाओं पर ही खर्च किया गया है। यह राशि कहां-कहां खर्च की गई है, इसका भी भाजपा प्रवक्ता अशोक गोयल एवं प्रवीश शंकर कपूर ने पूरा ब्यौरा दिया है। सीलिंग को लेकर दिल्ली में हालात बिगड़ने की संभावना बन रही है। व्यापारी अब बाजार बंद करने लगे हैं। सीलिंग नहीं रुकी और सरकार ने सीलिंग से बचाव के लिए सही कदम नहीं उठाए तो अगले सप्ताह पूरी दिल्ली को बंद रखने पर विचार किया जा रहा है। कारोबारियों का कहना है कि सीलिंग की वजह से आतंक का माहौल है। स्थानीय ग्राहक ही नहीं, बाहर के व्यापारियों का भी आना बंद हो गया है। इस वजह से पूरे उत्तर भारत में असर पड़ रहा है। पूरी दिल्ली सीलिंग की गिरफ्त में आने की वजह से करोड़ों रुपए का नुकसान रोजाना हो रहा है। इस सीलिंग के अभियान के चलते राजधानी में कानून व्यवस्था की बड़ी समस्या भी खड़ी हो सकती है।

Saturday, 20 January 2018

चीन भारत का चौतरफा घेराव कर रहा है

दक्षिण एशिया में लंबे समय से भारत का प्रभुत्व कायम रहा है, लेकिन अब चीन उसे कम करने में जुटा है। वह भारत के मित्र छोटे देशों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में जुटा है। भारत पड़ोसियों के साथ संबंध मजबूत बनाने की कितनी ही कोशिशें करे, लेकिन चीन उसमें रोड़ा अटकाता रहा है। श्रीलंका, नेपाल व मालदीव ऐसे देश हैं जिनके साथ भारत के हमेशा संबंध अच्छे रहे हैं। इन देशों को चीन अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए आर्थिक मदद का सहारा लेता है। हिमालय की श्रृंखला भारत को शेष एशिया से अलग करती है। इस उपमहाद्वीप में भारत की स्थिति विशाल हाथी के समान है। पाकिस्तान के साथ लंबे समय से शत्रुता का भाव भूलकर भारत ने छोटे पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की। लेकिन इन पड़ोसियों ने भारत की विशालता का कभी-कभी गलत मतलब भी निकाला। चीन इस स्थिति का फायदा उठा रहा है। उसने भारत के प्रभाव वाले क्षेत्रों में आर्थिक मदद के रूप में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ सप्ताहों को ही देख लीजिएöश्रीलंका ने नौ दिसम्बर को अपनी महत्वपूर्ण बंदरगाह 99 वर्ष की लीज पर उस कंपनी को सौंप दी जिसकी मालिक चीन सरकार है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने संसदीय चुनाव जीता और फिर उसने चीन से करीबी और भारत से दूरी बढ़ाने का आह्वान किया। मालदीव की संसद में नवम्बर में आपात सत्र बुलाया गया। बिना विपक्ष वाले उस सत्र में चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा कर दी गई। दक्षिण एशिया में ऐसा करने वाला वह पाकिस्तान के बाद दूसरा देश बन गया। चीन तेजी से भारत के इर्द-गिर्द पैर पसार रहा है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आज भी नेपाल में भारत का प्रभाव है परन्तु यह भी सच है कि नेपाल सरकार ने चीन के साथ कई डील कर रखी हैं। वहां हाल के चुनाव में बिजली, सड़क और देश के पहले नेटवर्क भी चीनी निवेश लाने के वादे शामिल हैं। चीन ने कुछ महीने पहले भूटान-चीन-भारत वाले त्रिकोणीय पठार (डोकलाम) में सेना भेजकर भारत-भूटान के संबंधों की परीक्षा ली। चीनी सेना वहां सड़क बनाना चाहती थी, लेकिन भारत के विरोध के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। चीन ने भूटान को लालच दिया कि वह सीमा विवाद सुलझाना चाहता है। भारत ने उसकी चाल नाकाम कर दी। कई दशकों से भूटान और भारत के संबंध मजबूत व गहरे हैं। अगर किसी एक विषय पर तुलना हो तो भारत चीन से कम नहीं है। भारत की विदेश नीतियों में संबंधों को लेकर कुछ खामियां हैं, लेकिन वह उसमें सुधार कर रहा है। खासतौर पर उत्तरी पड़ोसी देशों को लेकर। स्थितियां बदल रही हैं, भारतीय हाथी धीरे-धीरे ही सही रास्ते पर आ रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति का माकूल जवाब दे रहा है।

-अनिल नरेन्द्र

पाकिस्तान में कोई केस हाफिज साहब के खिलाफ नहीं है

पाकिस्तान आतंक और आतंकवादियों के प्रति न केवल हमदर्दी ही रखता है बल्कि उन्हें हर तरह से पनाह व समर्थन भी देता है। यह बात एक बार फिर साबित हो गई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद अब्बासी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहाöपाकिस्तान में कोई केस हाफिज सईद साहब के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर किसी के खिलाफ कोई केस रजिस्टर होगा तो कार्रवाई होगी। नवम्बर 2017 में भी अब्बासी ने कहा था कि भारत ने हाफिज सईद के खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं किया है। जिसके बल पर कानूनी कार्रवाई की जा सके। अब्बासी ने हाफिज सईद के बारे में पूछे जाने पर साहब कहते हुए बड़े अदब के साथ उसका नाम लिया। यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी हुकूमत ने हाफिज सईद का इस तरह बचाव किया है। हालांकि अनेक सबूतों से जाहिर है कि मुंबई के आतंकी हमले और भारत में हुई दहशतगर्दी की कई दूसरी वारदातों में हाफिज का हाथ था। मगर भारत की तरफ से पेश किए गए तमाम सबूतों को पाकिस्तान खारिज करता रहा है। बेशक वह अपनी तरफ से दुनियाभर में यह साबित करने की कोशिश करे कि पाकिस्तान में दहशतगर्दी की कोई जगह नहीं है मगर वह इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने न केवल हाफिज सईद को वांछित वैश्विक आतंकवादियों की सूची में नाम दर्ज कर रखा है बल्कि उसके ऊपर अमेरिका ने छह करोड़ रुपए से अधिक का इनाम भी घोषित कर रखा है। इससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि आतंकवाद पाकिस्तान सरकार की विदेश नीति का हिस्सा है। यह भी बार-बार साबित हो चुका है कि पाकिस्तानी हुक्मरान दहशतगर्दी व आतंकी संगठनों, सेना और वहां की खुफिया एजेंसी के हाथों की कठपुतली की तरह काम करते हैं। पाकिस्तानी हुकूमत चाहे जितना बचाव करे पर यह हकीकत दुनिया के सामने है कि हाफिज सईद पाकिस्तान में आतंकी संगठनों का सरगना है। खासकर भारत में दहशतगर्दी फैलाने में उसका अकसर हाथ रहता है। जब अमेरिका का दबाव पड़ा तो पाकिस्तान ने लश्कर--तैयबा पर प्रतिबंध जरूर लगा दिया था, लेकिन जमात-उद-दावा नाम से उसने नया संगठन खड़ा कर लिया था। यानी संगठन ने दुनिया की आंखों में धूल झोंकने हेतु सिर्फ अपना चोला बदल लिया। अपनी हुकूमत महफूज रखने की मंशा से बेशक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद अब्बासी हाफिज सईद का बचाव कर लें, पर देर-सबेर इसका उसे भी खामियाजा भुगतना पड़ेगा। भारत, अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र सभी को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता।

Friday, 19 January 2018

मोदी सरकार का बड़ा फैसला ः हज सब्सिडी समाप्त

केंद्र सरकार ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला करते हुए मुसलमानों को हज यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी समाप्त कर दी। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने एक प्रेसवार्ता में कहा कि इस साल से हज पर कोई सब्सिडी नहीं होगी। नकवी ने कहा कि हज पर सब्सिडी की व्यवस्था खत्म होने के बावजूद वर्ष 2018 में 1.75 लाख भारतीय मुसलमान हज पर जाएंगे। सरकार हर साल 700 करोड़ रुपए हज यात्रा की सब्सिडी पर खर्च करती थी। यह पहली बार हुआ है कि हज यात्रियों की सब्सिडी हटाई गई है। हज पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म होनी ही थी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 में ही इसे 10 सालों में चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के आदेश दिए थे। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह (सब्सिडी) माइनॉरिटी कम्युनिटी को लालच देना जैसा है और गवर्नमेंट को इस पॉलिसी को खत्म कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार धीरे-धीरे इस सब्सिडी को खत्म करे। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को 10 साल का वक्त दिया था, यानि 2022 तक सब्सिडी पूरी तरह से खत्म की जानी थी। इस आदेश का एक बड़ा आधार यह इस्लामी मान्यता बनी थी कि हज तो अपने पैसों से ही करना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक पंथनिरपेक्ष देश में हज के लिए सब्सिडी का कोई औचित्य नहीं बनता था। अगर केंद्र सरकार ने तय अवधि से चार साल पहले ही हज सब्सिडी खत्म करने का फैसला किया तो इसका मतलब है कि मुस्लिम समाज के शैक्षिक उत्थान के लिए जो पैसा 2022 से खर्च होना शुरू होता वह इसी साल से खर्च होने लगेगा। सरकार का कहना है कि यह फैसला अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किए बगैर लिया गया है। इस फैसले से आमतौर पर मुसलमान खुश हैं। उनका कहना हैöसब्सिडी  नहीं रोजगार चाहिए, लेकिन जो पैसा बचाकर मुसलमान लड़कियों की एजुकेशन पर खर्च करने की बात की जा रही है, वो न की जाए, बल्कि देश की सभी लड़कियों की बात की जाए। नहीं तो यह तुष्टिकरण ही होगा। उन्होंने कहा कि यह फैसला तो बहुत देर से हुआ। हज करने गरीब इंसान नहीं जाता और न हज उन पर वाजिब है बल्कि हज यात्रा करना उसी मुसलमान का फर्ज है जिसके पास खर्च के अलावा इतना पैसा है कि वो यात्रा कर सके। यह पैसा देश की गरीब जनता के हित में खर्च हो तो अच्छा है। एक मुसलमान का कहना था कि सब्सिडी मुसलमानों के साथ धोखा था। सच तो यह था कि एयर इंडिया को घाटे से उबारने के लिए सब्सिडी दी जाती थी। अब मुसलमान अच्छी और ज्यादा सहूलियत वाली फ्लाइट से सफर कर सकेंगे। दिल्ली वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़े जामा मस्जिद निवासी कहते हैं कि जो मुसलमान हज करने जाता था, वो अब भी जाएगा। इससे मुसलमानों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। जहां डेढ़ लाख रुपए मुसलमान यात्रा पर खर्च कर सकता है वहां 10 हजार रुपए और भी खर्च कर सकता है। फतेहपुरी मस्जिद के इमाम मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद कहते हैं कि खटारा जहाजों में सफर करके नुकसान उठाना पड़ रहा था। सब्सिडी के इस पैसे को बचाकर जो मुस्लिम लड़कियों पर खर्च करने की बात की जा रही है, वो न की जाए, बल्कि देश की सभी लड़कियों के लिए खर्च हो। हज के लिए सब्सिडी का कोई औचित्य नहीं बनता। हज यात्रियों को ऐसी कोई सुविधा इस्लामी देशों में भी नहीं दी जाती, लेकिन भारत में तुष्टिकरण की राजनीति के तहत ऐसा किया जाने लगा। निस्संदेह हज सब्सिडी  खत्म करने का यह मतलब नहीं कि हज यात्रियों को सुविधाएं देने अथवा उन्हें सस्ती यात्रा के विकल्प मुहैया कराने से मुंह मोड़ा जाए। अब पानी के जहाज से हज यात्रा की बात हो रही है। इसे सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए।

-अनिल नरेन्द्र